कुछ फिल्में दर्शकों से तालियाँ मांगती हैं, कुछ नारे लगवाती हैं, और कुछ ऐसी भी होती हैं जो आपको चुप करा देती हैं। इक्कीस तीसरी श्रेणी की फिल्म है। यह वह अनुभव है, जिसके बाद आप थिएटर से बाहर निकलते समय बोलना नहीं चाहते—क्योंकि गले में भावनाओं का भार होता है, शब्दों का नहीं।
श्रीराम राघवन निर्देशित इक्कीस 21 वर्ष की उम्र में परमवीर चक्र पाने वाले कैप्टन अरुण खेतरपाल की वीरगाथा नहीं, बल्कि उनकी अनुपस्थिति की कथा है—उस खालीपन की, जो किसी शहादत के बाद परिवार और समय में फैल जाता है।
फिल्म: इक्कीस
कलाकार: अगस्त्य नंदा, धर्मेंद्र, जयदीप अहलावत, सिमर भाटिया
निर्देशन: श्रीराम राघवन
रेटिंग: ★★★★☆ (4/5)
कहानी: युद्ध के शोर से परे एक स्मृति
फिल्म दो समय-रेखाओं में आगे बढ़ती है और यहीं से इसका स्वर पारंपरिक युद्ध फिल्मों से अलग हो जाता है।
एक ओर 1971 का भारत–पाक युद्ध है, जहां युवा टैंक कमांडर अरुण खेतरपाल (अगस्त्य नंदा) मोर्चे पर तैनात हैं। यह हिस्सा गोलियों, टैंकों और आदेशों से भरा है, लेकिन फिल्म इसे भी किसी उत्सवी गर्व की तरह नहीं दिखाती। यहां हर निर्णय के साथ जोखिम है, और हर पल में अंत की आहट।
दूसरी ओर कहानी हमें कारगिल युद्ध के बाद के वर्षों में ले जाती है। अरुण के पिता, ब्रिगेडियर एम. एल. खेतरपाल (धर्मेंद्र), एक कॉलेज रियूनियन के बहाने पाकिस्तान जाते हैं। यह यात्रा असल में किसी आयोजन की नहीं, बल्कि अतीत से सामना करने की है—एक ऐसे बेटे से, जो समय में वहीं रुक गया।
पाकिस्तानी अधिकारी ब्रिगेडियर नसीर (जयदीप अहलावत) की मेज़बानी में यह मुलाक़ात धीरे-धीरे एक ऐसे सच की ओर बढ़ती है, जिसे कोई ज़ोर से कहना नहीं चाहता। फिल्म का असली असर इसी टकराव में छुपा है—युद्ध के बाद की चुप्पी में, जहां जीत-हार के आंकड़े नहीं, बल्कि इंसानी स्मृतियां बोलती हैं।
निर्देशन: सूक्ष्मता की ताक़त, लेकिन असमान गति – इक्कीस
श्रीराम राघवन आम तौर पर अपने सस्पेंस और थ्रिलर टोन के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इक्कीस में वे एक संयमित, गंभीर और शांत भाषा चुनते हैं। कई दृश्य बेहद प्रभावशाली हैं—जैसे टैंक के पेरिस्कोप से झांकता चेहरा, जो एक क्षण के लिए इतिहास को जीवित कर देता है।
हालांकि, फिल्म की संरचना पूरी तरह संतुलित नहीं है। शुरुआती हिस्से में फ्लैशबैक का प्रवाह थोड़ा बिखरा हुआ लगता है और प्रशिक्षण से जुड़े दृश्य वह भावनात्मक गहराई नहीं बना पाते, जिसकी उम्मीद की जाती है। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म अपने दूसरे हिस्से में प्रवेश करती है, उसका स्वर बदल जाता है। संवाद कम होते जाते हैं, मौन गहरा होता जाता है—और यहीं से इक्कीस सच में अपनी पकड़ मजबूत करती है।
अभिनय: दो चेहरों के बीच चलती अदृश्य जंग
इस फिल्म की आत्मा दो कलाकारों में बसती है—धर्मेंद्र और जयदीप अहलावत।
धर्मेंद्र का अभिनय किसी बड़े संवाद पर निर्भर नहीं करता। उनकी आंखों की नमी, आवाज़ की थरथराहट और लंबे मौन ही सब कुछ कह देते हैं। यह उनके करियर की सबसे संवेदनशील और परिपक्व प्रस्तुतियों में से एक है, जहां एक पिता अपने दुख को ओढ़कर जीना सीख चुका है।
जयदीप अहलावत एक ऐसे पाकिस्तानी अधिकारी के रूप में सामने आते हैं, जो दुश्मन होते हुए भी शौर्य का सम्मान करना जानता है। उनका अभिनय किसी राजनीतिक बयान की तरह नहीं, बल्कि एक इंसान की तरह महसूस होता है। दोनों कलाकारों के बीच के दृश्य—खासकर अंतिम हिस्से में—फिल्म को साधारण युद्ध कथा से कहीं ऊपर उठा देते हैं।
अगस्त्य नंदा शारीरिक रूप से भूमिका के अनुरूप हैं और उनकी गंभीरता विश्वसनीय लगती है, लेकिन भावनात्मक स्तर पर उनका अभिनय सीमित रह जाता है। शहादत के भीतर चल रही मानसिक उथल-पुथल को वे पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाते।
सिमर भाटिया, अपने पहले ही प्रयास में, संयमित और सहज नजर आती हैं। उनका किरदार शोर नहीं मचाता, लेकिन अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है।
संगीत और तकनीकी पक्ष
तनुज टिकू और केतन सोढ़ा का बैकग्राउंड स्कोर भावनाओं को उभारता है, लेकिन उन पर हावी नहीं होता। युद्ध दृश्य वास्तविक लगते हैं—बिना अनावश्यक नाटकीयता या अतिरंजित देशभक्ति के। सिनेमैटोग्राफी का रंग-रूप भी फिल्म के मूड के अनुरूप संयत और ठंडा है।
दृष्टिकोण: शोर नहीं, सम्मान – इक्कीस
आज की अधिकतर युद्ध फिल्में जहां आक्रामक राष्ट्रवाद का रास्ता चुनती हैं, इक्कीस एक कठिन लेकिन ईमानदार विकल्प अपनाती है। यह फिल्म स्वीकार करती है कि युद्ध में भी सम्मान हो सकता है—भले ही सीमाएं अलग हों।
यह विचार हर दर्शक को सहज नहीं लगेगा, और शायद फिल्म भी इस असहजता को जानती है। इसलिए अंत में वह एक स्पष्ट संदेश देती है, ताकि भावनाओं को गलत दिशा न मिले।
