आज के समय में जब देशभक्ति सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट और वॉट्सऐप स्टेटस तक सिमट गई है, वहीं उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में रहने वाले एक युवक ने अपने पूरे शरीर को देश के लिए समर्पित कर दिया है। नाम है – अभिषेक गौतम।
यह वही अभिषेक हैं जिनकी पीठ पर 636 शहीदों के नाम और 11 महापुरुषों के टैटू गुदे हुए हैं। न कोई प्रचार का मकसद, न कोई इनाम की चाहत। बस एक सपना – देश को अपने शहीदों और नायकों की याद दिलाना।
कौन हैं अभिषेक गौतम?
अभिषेक कोई सेलिब्रिटी नहीं हैं, न ही कोई राजनेता। एक आम इंसान हैं, लेकिन उनके ख्वाब और सोच बेहद खास है। वे मानते हैं कि आज की पीढ़ी देश के सच्चे नायकों को भूलती जा रही है — किताबों में सीमित हो गए हैं भगत सिंह, आजाद, बोस और बिस्मिल।
इसी सोच ने उन्हें प्रेरित किया कि क्यों न अपने शरीर को ही इतिहास बना दिया जाए। उन्होंने एक-एक कर 636 शहीदों के नाम अपनी पीठ पर गुदवाए — वो भी स्थायी टैटू के रूप में।
636 शहीदों की अमर गाथा — शरीर पर
अभिषेक ने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर कारगिल युद्ध और हाल की सीमा पर हुई झड़पों तक, हर उस वीर का नाम अपनी पीठ पर जगह दी है जिसने देश के लिए जान दी।
उनका मानना है, “शहीदों को दी जाने वाली सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही है कि उन्हें भूला न जाए। मैंने अपने शरीर को उनके नामों से भर दिया ताकि मैं जब भी आइना देखूं, मुझे याद रहे कि मेरा अस्तित्व इन्हीं के बलिदान पर टिका है।”
अभिषेक में 11 महापुरुषों की प्रेरणा
सिर्फ शहीदों तक ही नहीं, अभिषेक ने डॉ. भीमराव अंबेडकर, महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, जैसे 11 ऐतिहासिक महापुरुषों की आकृतियां और उनके आदर्श वाक्य भी अपने शरीर पर गुदवाए हैं।
वे कहते हैं, “इन महापुरुषों ने सिर्फ देश को आज़ाद नहीं कराया, बल्कि हमें सोचने, बोलने और जीने की आज़ादी दी। इनकी विचारधारा आज भी उतनी ही ज़रूरी है जितनी पहले थी।”
कारगिल के बलिदानों को दी खास श्रद्धांजलि
अभिषेक इससे पहले भी सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने कारगिल युद्ध के शहीदों के नाम भी अपने शरीर पर गुदवाए थे। उनके अनुसार, “हमने फिल्मों में कारगिल देखा, न्यूज़ में सुना, लेकिन असल बलिदान को महसूस नहीं किया। मैंने कोशिश की कि उन वीरों की कुर्बानी को कुछ इस तरह जिया जाए कि वो कभी भुलाए न जा सकें।”
लोगों की प्रतिक्रिया: चलता-फिरता शहीद स्मारक
अभिषेक की इस मुहिम को सोशल मीडिया पर लोगों ने दिल से सराहा है। ट्विटर से लेकर इंस्टाग्राम तक, हर जगह उन्हें “चलता-फिरता शहीद स्मारक” कहा जा रहा है।
कई यूज़र्स ने यह तक लिखा कि सरकार को उन्हें राष्ट्रीय सम्मान देना चाहिए। उनका यह योगदान न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि एक नई पीढ़ी के लिए चेतावनी भी है — “आजादी मुफ्त नहीं मिली थी, इसकी कीमत चुकाई गई थी — खून से।”
अभिषेक का सपना — हर बच्चा जाने अपने नायक को
अभिषेक का मकसद सिर्फ टैटू बनवाना नहीं था। वे चाहते हैं कि आज का हर युवा, हर बच्चा ये नाम पढ़े, पूछे — “ये कौन थे?” और तब इतिहास खुद बोले।
वो कहते हैं — “जब भी कोई मेरा टैटू देखता है और सवाल करता है, मैं उसे उन शहीदों की कहानी सुनाता हूं। यही मेरी सबसे बड़ी जीत है। यही मेरा मिशन है।”
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