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25 जनवरी 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 77वें गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) की पूर्व संध्या पर पूरे देश को शाम 7 बजे अपने संबोधन के माध्यम से संदेश दिया। अपने भाषण में उन्होंने भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों, संविधान की अहमियत, देश की प्रगति और नागरिकों की साझा जिम्मेदारी पर विस्तार से जोर दिया। यह संदेश देशवासियों के लिये सोचने, गर्व महसूस करने और राष्ट्र-निर्माण में नई ऊर्जा भरने का अवसर भी रहा।

गणतंत्र दिवस का पावन अवसर और देश की दिशा

राष्ट्रपति ने अपने संबोधन की शुरुआत यह कहते हुए की कि 26 जनवरी का दिन भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य का दृष्टिकोण समझने का महत्वपूर्ण अवसर है। उन्होंने याद दिलाया कि 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ और 26 जनवरी 1950 से हमारा संविधान पूरी तरह लागू हुआ, जिससे हमारा लोकतांत्रिक गणराज्य स्थापना की दिशा में आगे बढ़ा। इस दिन संविधान के आदर्श — न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व (भाईचारा) — को अपनाने की प्रेरणा मिलती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि हमारा संविधान न केवल हमारे शासन-प्रणाली का आधार है, बल्कि यह विश्व इतिहास के सबसे बड़े गणतंत्र का सम्मानित दस्तावेज भी है, जो मानवता के लिये न्याय और समानता का मार्गदर्शन करता है। उन्होंने संविधान के निर्माताओं के दूरदर्शी दृष्टिकोण की सराहना की, जिन्होंने देश में राष्ट्रीय एकता और संविधानिक मूल्यों को मजबूत आधार प्रदान किया।

“वंदे मातरम” का ऐतिहासिक महत्व और प्रेरणा – गणतंत्र

संबोधन के दौरान राष्ट्रपति मुर्मू ने “वंदे मातरम” की ऐतिहासिक और भावनात्मक भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भारती महास loop या “वंदे मातरम” गीत का अनुवाद और विभिन्न भाषाओं में लोकप्रियता ने इसे एक राष्ट्र-वंदना में बदल दिया। इस गीत ने देश के लोगों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और देशभक्ति की भावना को नये स्तर तक पहुंचाया।

राष्ट्रपति ने कहा कि वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि हमारे देश की आत्मिक शक्ति और प्रेरणा का स्रोत है — वह शक्ति जो भारत को विश्व पटल पर एक मजबूत लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में स्थापित करती है।

नागरिकों की भूमिका और देश की प्रगति

राष्ट्रपति मुर्मू ने पूरे देश के नागरिकों का राष्ट्रनिर्माण में योगदान सराहा। उन्होंने कहा कि हमारी सेना, पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र बल देश की सुरक्षा में हमेशा सतर्क हैं, जबकि किसान देश को अन्नदाता के रूप में पोषण और खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराते हैं। इसके अलावा उन्होंने देश के डॉक्टरों, नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों की सेवाओं की भी प्रशंसा की, जिनकी कड़ी मेहनत लोगों का स्वास्थ्य सुरक्षित रखती है।

उन्होंने कहा कि शिक्षक भावी पीढ़ियों को तैयार करते हैं, वैज्ञानिक और इंजीनियर देश के विकास की दिशा को नयी ऊंचाइयों पर ले जाते हैं, और हमारा युवा वर्ग देश के उज्ज्वल भविष्य की आशा बनकर उभर रहा है।

महिलाओं और दलित, पिछड़े वर्गों को सशक्त बनाना – गणतंत्र

राष्ट्रपति ने महिलाओं के बढ़ते योगदान का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि महिलाएं अब पारंपरिक बाधाओं को पार करते हुए हर क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं — चाहे वह खेल, विज्ञान, शिक्षा हो या सामाजिक नेतृत्व। उन्होंने महिला स्वरोजगार, खेल अभियानों और राजनीतिक भागीदारी को सफल उदाहरण बताया।

राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि सरकार समाज के कमजोर और पिछड़े वर्गों के लिये समावेशी योजनाओं और कल्याण गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित कर रही है, ताकि उनके जीवन में सुधार और समान अवसर सुनिश्चित किया जा सके।

भारत की अर्थव्यवस्था और समृद्धि की दिशा

अपने भाषण में राष्ट्रपति ने भारत की आर्थिक प्रगति को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज भारत विश्व का सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला प्रमुख अर्थव्यवस्था है और वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद निरंतर वृद्धि दर्ज कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत जल्द ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है, इस प्रक्रिया में आत्मनिर्भरता और स्वदेशी को मार्गदर्शक सिद्धांत बताया।

उन्होंने GST (वस्तु एवं सेवा कर) के कार्यान्वयन और लगातार आर्थिक सुधारों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन कदमों से देश की आर्थिकी को मजबूती और स्व-एकीकृत बाजार की दिशा में सहायता मिली है।

लोकतंत्र, मतदाता और युवा भागीदारी

राष्ट्रपति ने आज राष्ट्रीय मतदाता दिवस (25 जनवरी) के अवसर पर कहा कि लोकतांत्रिक भागीदारी — विशेष रूप से महिलाओं और युवाओं की बढ़ती भूमिका — भारत के लोकतंत्र को और अधिक सशक्त बना रही है। उन्होंने भिम्राव अंबेडकर के मतदाता-शिक्षा के विचार का उल्लेख करते हुए कहा कि मतदान केवल अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्य भी है, जो लोकतांत्रिक चेतना और राजनीतिक जागरूकता को मजबूत करता है।

संस्कृति, संतुलन और विश्व-शांति – गणतंत्र

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत ने अपने समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक इतिहास के माध्यम से मानवता को अनेकों ज्ञान प्रदान किये हैं — जैसे योग, आयुर्वेद और लोक-दर्शन। उन्होंने संस्कृति को राष्ट्रीय पहचान और विश्व-शांति का आधार बताया।

उन्होंने श्री नारायण गुरु के विचार के उदाहरण के साथ कहा कि “जात-भेद मुक्त समाज और भ्रातृत्व का आदर्श” आज भी हमारी राष्ट्रीय भावना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

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