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ग्रेटर नोएडा में 16-17 जनवरी 2026 की रात हुई दर्दनाक घटना, जिसमें 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की गहरे पानी भरे गड्ढे में डूबकर मौत हो गई थी, अब एक कानूनी मोड़ पर आ गई है। आज 6 फरवरी 2026 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नोएडा पुलिस की कार्रवाई को गंभीर माना और मुख्य आरोपी बिल्डर को रिहा करने का आदेश दिया है — इस आदेश ने पूरे मामले को फिर से सुर्खियों में ला दिया है।

यह फैसला विशेष रूप से गिरफ्तारी की प्रक्रिया में हुई कथित लापरवाही पर केंद्रित है, जिसे हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है।

हाईकोर्ट का रुख: गिरफ्तारी नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ (न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय) ने सुनवाई के दौरान कहा कि पकड़े गए आरोपी के खिलाफ गिरफ्तारी की प्रक्रिया में पुलिस ने आवश्यक कानूनी औपचारिकताओं का पालन नहीं किया, जो न सिर्फ “संविधान के अनुच्छेद 21” का उल्लंघन है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के गिरफ्तारी के दिशा-निर्देशों का भी स्पष्ट उल्लंघन है।

न्यायालय ने हैबियस कॉर्पस याचिका में दलील दी गई बातों को गंभीरता से लिया कि गिरफ्तारी के समय अरेस्ट मेमो की क्लॉज-13 का अनुपालन नहीं किया गया, और न ही आरोपी को उसकी कानूनी प्रतियां और सही अधिकारों की जानकारी दी गई। अदालत के अनुसार, यह चूक इतनी गंभीर है कि इसे “वैधानिक तौर पर अवैध” माना जाना चाहिए।

इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब गिरफ्तारी ही अवैध है, तो उससे संबंधित रिमांड और हिरासत के आदेश भी अवैध माने जाएंगे। इसी आधार पर कोर्ट ने आदेश दिया कि पुलिस तुरंत आरोपी बिल्डर अभय कुमार को रिहा करे।

मुख्य आरोपी कौन है, क्या है आरोप?

मुख्य आरोपी बिल्डर अभय कुमार ‘एमजेड विजटाउन’ का निदेशक था, उस निर्माण स्थल का जहां गहरे गड्ढे में पानी भरा हुआ था। पुलिस ने दावा किया कि निर्माण स्थल पर सुरक्षा मानकों का उल्लंघन हुआ था, जिससे गड्ढा बहुत खतरनाक स्थिति में था।

इस गड्ढे में युवराज की कार डूब गई थी और शोध व पुलिस की प्रारंभिक जांच में पाया गया कि वहाँ कोई चेतावनी संकेत, बैरिकेड या रोशनी नहीं थी। युवराज ने अपने मोबाइल से लाइव लोकेशन दी थी और पिता को फोन भी किया, परंतु कोहरे व लापरवाही के कारण बचाव में देरी हुई और युवराज पानी में डूब गया।

पुलिस ने इस मामले में MZ Wiztown Planners और अन्य बिल्डरों, जैसे रवि बंसल और सचिन करनवाल, के खिलाफ FIR दर्ज की थी। FIR में आरोप था कि बिल्डर ने सुरक्षा नियमों को तोड़कर जीवन-पर्यंत खतरनाक स्थिति पैदा की, जिससे युवराज की मृत्यु हुई।

युवराज मामले पर हाईकोर्ट का आदेश: क्या हुआ पहले?

इससे पहले गौतमबुद्धनगर की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 20 और 21 जनवरी को बिल्डर अभय कुमार के खिलाफ रिमांड आदेश जारी किया था। लेकिन हाईकोर्ट ने अब यही रिमांड अवैध करार देते हुए उसे निरस्त कर दिया है।

हाईकोर्ट ने पुलिस और प्रशासन को यह निर्देश भी दिया कि आदेश की प्रतिलिपि तुरंत संबंधित अधिकारियों को दी जाए ताकि किसी भी तरह की देरी न हो और आरोपी तुरंत रिहा किया जा सके।

इससे पहले इस केस में लोटस ग्रीन प्रोजेक्ट के दो कर्मचारियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है — यानी उन्हें हिरासत से रिहा किया गया था। वहीं बिल्डर अभय कुमार की याचिका को पहले निचली अदालत ने खारिज कर दिया था, और अगली सुनवाई 13 फरवरी के लिए निर्धारित की गई थी।

न्याय के सवाल: अपराध बनाम प्रक्रिया

इस आदेश से यह स्पष्ट होता है कि कोर्ट जांच की स्वतंत्रता और कानूनी प्रक्रिया के अनुपालन को प्राथमिकता देता है। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि गिरफ्तारी प्रक्रिया कानून के अनुसार नहीं हुई, तो पूरी गिरफ्तारी की वैधता ही खंडित हो जाती है — भले ही उसके पीछे गंभीर आरोप हों।

यह कदम यह भी दर्शाता है कि अदालत सुप्रीम कोर्ट के कानून व्याख्या के दिशा-निर्देशों पर भी खड़ी है, जहां गिरफ्तारी के समय स्पष्ट नियमों का पालन जरूरी माना गया है।

युवराज के परिवार और जनता की प्रतिक्रिया

युवराज के पिता और स्थानीय समुदाय पहले से ही लगातार न्याय की मांग करते रहे हैं। कई नागरिकों ने कहा है कि यह एक सिस्टम की विफलता है जिसमें प्रशासन, बिल्डरों और सुरक्षा एजेंसियों की अनदेखी ने एक युवा की जान ले ली।

इसके अलावा इस मामले में रेस्क्यू ऑपरेशन और प्रशासन के कामकाज की आलोचना भी की गई है। कई लोगों ने कहा कि शुरुआती बचाव कार्य में देरी और संसाधनों की कमी ने दुखद परिणामों को जन्म दिया।

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