राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने आज लखनऊ में एक जन-गोष्ठी में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक बयान दिया जिसमें उन्होंने कहा कि मंदिरों से होने वाली आय का मुख्य उपयोग जनकल्याण और सामाजिक विकास के कार्यों में होना चाहिए, और इसका प्रबंधन सीधे उन भक्तों के हाथों में रखा जाना चाहिए, न कि सरकार के नियंत्रण में। यह बयान संघ के सौ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम के दौरान आया, जिसमें भागवत ने विभिन्न सामाजिक और संगठनात्मक विषयों पर अपने विचार साझा किए।
उन्होंने कहा कि मंदिरों की कमाई का बड़ा हिस्सा सामाजिक विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीब कल्याण और सेवा-कार्य में लगाने की आवश्यकता है ताकि उनका प्रभाव केवल धार्मिक उद्देश्यों तक सीमित न रहे बल्कि सीधे समाज के कमजोर वर्गों तक पहुँचे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे प्रयासों की निगरानी पारदर्शी, निष्पक्ष और ईमानदार संस्था† के तहत होनी चाहिए, जिससे किसी भी तरह की अनियमितता या भ्रष्टाचार से बचा जा सके।
बयान की पृष्ठभूमि और संघ का दृष्टिकोण – मोहन
डॉ. भागवत का यह बयान उस व्यापक सोच की पुष्टि करता है जो संघ वर्षों से व्यक्त करता आया है — कि धार्मिक संस्थाओं को केवल पूजा-अर्चना के केंद्र के रूप में नहीं बल्कि समाज को आगे ले जाने वाले सामाजिक संगठन के रूप में देखा जाना चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में भागवत ने कई मौकों पर यह रेखांकित किया है कि धार्मिक स्थल सिर्फ पूजा-स्थान नहीं बल्कि समाज में सामाजिक समरसता, शिक्षा, सेवा और एकता फैलाने वाले केंद्र होने चाहिए।
पिछले वर्षों में उन्होंने कहा है कि “भक्तों को मंदिरों के संचालन और नियंत्रण का अधिकार होना चाहिए, न कि सिर्फ सरकारी व्यवस्थाओं को देना।” इस प्रकार मंदिरों की व्यवस्थाएँ समुदाय और सच्चे भक्तों के हाथों में रहने चाहिए ताकि धार्मिक स्थल समाज के हित में निर्णय ले सकें।
ऐसे विचार संघ के सामाजिक दर्शन — सेवा, समर्पण और सामाजिक उत्तरदायित्व — से मेल खाते हैं, जिसका उद्देश्य धार्मिक आस्था को समाज-उन्नति में बदलना है।
भक्तों के जिम्मेदारी के संदर्भ में मोहन भागवत की बात
भागवत ने कहा कि मंदिरों की आय सिर्फ पूजा-कर्म और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसे समाज के हर कमजोर वर्ग तक पहुँचना चाहिए। उन्होंने विशिष्ट रूप से कहा कि इसकी बागडोर सरकार के हाथों में नहीं बल्कि जिम्मेदार भक्तों के हाथों में होनी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि मंदिर की कमाई को ऐसे लोगों के नियमन में रखा जाना चाहिए जो धर्म के साथ-साथ विश्वास, पारदर्शिता और सेवा भावना रखते हों।
भागवत ने यह स्पष्ट किया कि सरकार के पास “मंदिरों पर कोई रिमोट कंट्रोल नहीं है” और संघ सिर्फ सुझाव दे सकता है, लेकिन अंततः मंदिरों को समाज-सेवा की दिशा में ले जाने की ज़िम्मेदारी भक्तों और समुदाय को ही उठानी होगी।
राजनीतिक तथा सामाजिक प्रतिक्रियाएँ
भागवत के इस बयान के बाद कई राजनैतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं:
✦ समर्थन के स्वर
कुछ सामाजिक संगठनों और धर्मार्थ समुदायों ने इस विचार का स्वागत किया है और कहा है कि मंदिरों के धन का उपयोग स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबों की सहायता में होना चाहिए, जैसे धर्मार्थ अस्पताल चलाना, स्कूली शिक्षा देना, भोजन वितरण कार्यक्रम आदि। ऐसे कदम समाज को स्थिर और समृद्ध बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।
✦ विरोध और चिंता
वहीं कुछ आलोचकों ने यह चिंता जताई है कि मंदिरों के धन को सामाजिक विकास में लगाने का प्रश्न संवैधानिक अधिकारों, धर्म-निर्वाचक स्वतंत्रता तथा धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता से जुड़ा हुआ है, जिससे संभावित राजनीतिक हस्तक्षेप और धार्मिक-राजनीतिक विवाद की स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
कुछ समर्थक यह भी मानते हैं कि मंदिरों की आय का सामाजिक उपयोग करने का विचार इस देश की पहली जरूरत है, लेकिन इसके लिए एक स्थिर और पारदर्शी नियमन प्रणाली विकसित करना भी उतना ही जरूरी है।
सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव – मोहन
अगर मंदिरों की आय का बड़ा हिस्सा वास्तव में सामाजिक विकास कार्यों में लगाया जाता है, तो इसके निम्न-लिखित प्रभाव हो सकते हैं: – मोहन
1 ) शिक्षा क्षेत्र में सुधार
धन का उपयोग गरीब छात्रों के लिए छात्रवृत्ति, स्कूलों की स्थापना और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाने में किया जा सकता है।
2) स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार
ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में स्वास्थ्य केंद्र, जन स्वास्थ्य कार्यक्रम और मुफ्त चिकित्सा जांच जैसी सेवाएँ शुरू की जा सकती हैं।
3) महिला एवं बाल कल्याण
महिला-सशक्तिकरण योजनाएँ, मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाएँ तथा नारी सुरक्षा सहयोग योजनाएँ बढ़ाई जा सकती हैं। – मोहन
4) आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को सहायता
गरीब, दिव्यांग और बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा निधियाँ और रोजगार प्रशिक्षण कार्यक्रम संस्थागत रूप से विकसित किए जा सकते हैं।
इन सामाजिक और आर्थिक पहलुओं से यह स्पष्ट होता है कि अगर मंदिरों की कमाई का सामाजिक विकास में उपयोग धृढ़तापूर्वक किया जाए, तो यह देश के विकास और सामाजिक उत्थान में बड़ा योगदान दे सकता है।
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