असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने 2 जनवरी 2026 को कांग्रेस पार्टी पर एक गंभीर राजनीतिक आरोप लगाया है जो आज राज्य और देश के राजनीतिक माहौल में व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है। सरमा का दावा है कि कांग्रेस ’मियां-मुस्लिम’ बहुल विधानसभा सीटों पर प्रत्याशी बनने के लिए पार्टी से 3-4 करोड़ रुपये तक की मांग कर रही है, जो चुनाव प्रक्रिया में पैसों की भूमिका पर बहस को और तेज कर रहा है।
क्या है मामला? – असम
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने संवाददाताओं से बातचीत में आरोप लगाया कि आगामी असम विधान सभा चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी ’मियां-मुस्लिम’ बहुल सीटों पर उम्मीदवारों से 3-4 करोड़ रुपये ले रही है। ये आरोप उन्होंने सोनितपुर लोकसभा क्षेत्र में एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान लगाए। सरमा ने कहा कि यह “पाठ्यक्रम” पिछले चुनावों से जारी है और कांग्रेस इसी प्रक्रिया को अपनाती रही है।
उन्होंने बताया कि उम्मीदवारों ने न केवल फीस दी बल्कि कुछ मामलों में पहले से अग्रिम राशि भी जमा की है। भाजपा सरकार की तरफ से दावा किया गया है कि कांग्रेस का यह तरीका पैसे आधारित व्यवस्था का हिस्सा है।
असम में क्या कांग्रेस फीस ले रही है?
सरमा ने यह भी कहा कि कांग्रेस पार्टी सामान्य आवेदन फीस के रूप में ही ₹50,000 वसूलती है, लेकिन पार्टी इसके अलावा उन क्षेत्रों में, जहाँ मियां-मुस्लिम समुदाय का जनसंख्या अनुपात ज्यादा है, महंगे दाम वसूलने का प्रयास कर रही है ताकि वहां से उम्मीदवार टिकट पा सकें। उनका यह भी कहना था कि भाजपा में टिकट पाने के लिए कोई फीस नहीं ली जाती।
कांग्रेस पार्टी की तरफ से इन आरोपों पर तुरंत कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं आई है
’मियां-मुस्लिम’ शब्द और राजनीतिक पृष्ठभूमि

‘मियां-मुस्लिम’ शब्द असम में बहुसंख्यक क्षेत्रीय राजनीति का एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। यह शब्द मुख्य रूप से बांग्लादेश-मूल के बंगाली-भाषी मुसलमानों को संदर्भित करता है, जिनके बारे में स्थानीय राजनीति में विवादास्पद विचार और बयानों की राजनीति होती रही है। कुछ समुदाय इसे अपमानजनक मानते हैं, लेकिन इसी शब्द को कुछ समूहों ने अपनी पहचान के तौर पर अपनाया भी है।
सरमा के आरोप ऐसे समय में आए हैं जब असम में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियाँ जोरों पर हैं, और जनसंख्या, पहचान और उम्मीदवार चयन जैसे मुद्दे राजनीतिक एजेंडा का मुख्य हिस्सा बन गए हैं।
राजनीतिक और सामाजिक प्रसंग
यह आरोप राजनीतिक रूप से संवेदनशील है क्योंकि असम में जनसंख्या संतुलन और धार्मिक-भाषाई पहचान आज भी चुनाव में बड़ा मुद्दा हैं। हाल ही के दिनों में सरमा ने यह भी कहा है कि असम में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है, और उन्होंने हिंदुओं से तीन बच्चों की अपील की है ताकि जनसंख्या संतुलन बन सके — यह बयान भी व्यापक चर्चा का कारण बना है।
सरमा ने यह भी कहा कि बांग्लादेशी-मूल के अनुमानित 40% ‘मियां-मुस्लिम’ आबादी 2027 तक असम में हो सकती है — यह बयान भी सामाजिक और राजनीतिक बहस को और तेज करता है।
असम चुनाव की पृष्ठभूमि
असम में विधानसभा चुनाव मार्च-अप्रैल 2026 में होने की संभावना जताई जा रही है और राजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवारों की घोषणा और टिकट वितरण की प्रक्रिया जनवरी में शुरू हो चुकी है। इसी संदर्भ में कांग्रेस ने 5 से 20 जनवरी तक टिकट के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू की है, जिसमें बैंक ड्राफ्ट द्वारा ₹50,000 जमा कराना आवश्यक है।
भाजपा अल्प समय पहले “मेरा बूथ सबसे मजबूत” जैसी मुहिम भी चला चुकी है, जिसका मकसद grassroots स्तर पर भाजपा की पकड़ को मजबूत करना है और कांग्रेस को निशाना बनाना है।
आलोचना और प्रतिक्रियाएँ
सियासी हलकों में इससे पहले भी धर्म, पहचान और वोट बैंक को लेकर बयानबाज़ी होती रही है। सरमा के बयान के बारे में विपक्षी दलों का कहना है कि यह आरोप चुनावी रणनीति का हिस्सा है और विपक्षी पार्टियों को बदनाम करने का प्रयास है। कांग्रेस नेताओं ने इसे राजनीतिक बदनामगी करार दिया है लेकिन अभी तक कोई विस्तृत बयान नहीं आया है।
इस बीच विपक्षी दलों का मत है कि आवेदन फीस के अलावा कोई अन्य रकम वसूली जा रही है या नहीं, इसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
विश्लेषण: क्या यह आरोप चुनावी राजनीति का हिस्सा है?
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे आरोप चुनाव के समीप आते ही आम होते हैं, जब पार्टियाँ अपने विरोधी पर चुनावी रणनीति के बहाने आरोप लगाती हैं। असम की राजनीतिक परिदृश्य में धार्मिक-आधारित मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण है, इसलिए यह आरोप अपेक्षाकृत बड़े मुद्दे को जन्म दे सकते हैं।
हालांकि यह भी सच है कि भारत में पैसा-राजनीति और टिकट वसूली जैसी बातें लंबे समय से चुनावी सिस्टम का विवादास्पद हिस्सा रही हैं। यदि इन आरोपों पर सत्यापित सबूत सामने आते हैं, तो यह राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा बन सकता है।
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