25 जनवरी 2026 को रूस के सरकारी सूत्रों ने एक बड़ा बयान जारी किया है जिसमें कहा गया है कि यूरोपीय देश अपनी पुरानी रूसी निर्भरता से तो मुक्त हो गए हैं, लेकिन अब वे अमेरिका पर एक नई ‘निर्भरता’ में फँस गए हैं। इस बयान से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई है क्योंकि यह हालात वैश्विक शक्ति संतुलन और सुरक्षा स्थितियों को प्रभावित कर सकते हैं।
क्रेमलिन क्या कहना चाहता है? – क्रेमलिन – यूरोपीय
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने एक साक्षात्कार में कहा कि यूरोप ने पहले रूस पर जो निर्भरता थी—वह परस्पर निर्भरता (mutual dependence) थी, जिसमें रूस एक विक्रेता के तौर पर और यूरोपीय देश खरीदार के रूप में काम करते थे। लेकिन पश्चिमी प्रतिबंधों और राजनीतिक निर्णयों के चलते ये निर्भरता खत्म हो गई।
अब, पेस्कोव के अनुसार, यूरोपीय देश पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भरता की स्थिति में आ गए हैं, खासकर सुरक्षा, रक्षा, आर्थिक और रणनीतिक फैसलों में। उन्होंने यह भी कहा कि यह परिवर्तन राजनीतिक नेतृत्व की गिरावट और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की बिगड़ती स्थिति को दर्शाता है।
पेस्कोव ने यह भी प्रकट किया कि रूस और अमेरिका के बीच बातचीत के लिए कोई वास्तविक प्रयास नहीं हो पा रहे हैं, और यूरोप की नई स्थिति से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति प्रभावित हो रही है।
क्यों है यह बयान अहम?
यह बयान ऐसे समय आया है जब ग्लोबल पॉलिटिक्स में अमेरिका और यूरोपीय देशों के रिश्तों पर कई दबाव हैं:
- अमेरिका की नई नीतियाँ और टैरिफ रणनीति ने यूरोप समेत कई देशों को व्यापार और अर्थव्यवस्था के फैसलों पर पुनर्विचार के लिए मजबूर किया है।
- यूरोपीय यूनियन खुद अपनी सुरक्षा और तकनीकी स्वायत्तता बढ़ाने की दिशा में योजनाएँ बना रहा है, ताकि अमेरिका पर निर्भरता कम हो सके।
यूरोपीय देशों के रणनीतिक फैसले जैसे रक्षा उद्योग को मजबूत करना, तकनीकी साझेदारियों को बढ़ावा देना और स्वतंत्र नीति निर्माण की दिशा में प्रयास करना—ये सब संकेत दे रहे हैं कि यूरोप अमेरिका पर निर्भरता की इस नई स्थिति से उठना चाहता है।
पिछला रूप: रूसी निर्भरता से मुक्त – क्रेमलिन – यूरोपीय
रूस और यूरोप के ऐतिहासिक संबंधों में ऊर्जा, तेल, गैस और व्यापार निर्भरता का बड़ा हिस्सा रहा है। यूरोप लंबे समय तक रूस से ऊर्जा आयात पर निर्भर रहा था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यूरोपीय देशों ने अन्य स्रोतों और रणनीतियों की तरफ़ रुख किया है, जिससे रूस के आर्थिक प्रभाव में गिरावट आई है।
हालाँकि, पेस्कोव ने यह कहा कि यह निर्भरता केवल “क्षणिक” (transient) थी और दोनों पक्षों की भूमिका थी, जिसमें रूस भी यूरोप पर निर्भर था और यूरोप भी रूस पर। लेकिन अब रूस ने इसे खत्म कर दिया है, और यूरोप नई वैश्विक चुनौतियों का सामना अमेरिका पर अधिक निर्भरता के रूप में कर रहा है
यूरोप के दृष्टिकोण से विवाद
रूस के बयान के विपरीत, कुछ यूरोपीय नेताओं और विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका पर निर्भरता को संपूर्ण रूप से नई निर्भरता कहना सही नहीं है। यूरोप अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) को बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है, विशेष रूप से:
✔️ रक्षा उत्पादन को मजबूत करना
तकनीकी और डिजिटल क्षेत्रों में स्वावलंबन
✔️ व्यापारिक साझेदारियों को विविध करना (जैसे चीन, भारत, अन्य साझेदार)
.✔️ सामरिक साझेदारी में अधिक विकल्प जोड़ना
इन पहलों का उद्देश्य केवल अमेरिका से दूरी नहीं, बल्कि निर्णय लेने में स्वतंत्रता और सुरक्षा संतुलन होना है।
यूरोपीय यूनियन के वरिष्ठ अधिकारी भी यह कहते रहे हैं कि विश्व राजनीति बहुध्रुवीय (multipolar) बन रही है और किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर रहना “भविष्य की रणनीति नहीं” हो सकती
नए वैश्विक संदर्भ में इसका मतलब क्या है? यूरोपीय
आज का अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक माहौल बदल रहा है। वैश्विक शक्ति संतुलन में एकतरफा निर्भरता की अवधारणा मुश्किल होती जा रही है, क्योंकि:🔹 आर्थिक और शक्ति केंद्र बंट रहे हैं
🔹 बड़े देशों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है
रक्षा और तकनीकी प्रौद्योगिकी निर्णय अधिक स्वायत्तता चाहते हैं
🔹 व्यापार समझौते और भू-राजनीतिक गठबंधन बदल रहे हैं
इन परिस्थितियों में रूस का यह बयान एक राजनीतिक विश्लेषण भी माना जा रहा है कि यूरोप ने अपनी पुरानी चुनौतियों को तो खत्म किया, लेकिन अब वह नई चुनौतियों की ओर अग्रसर है — जिसमें अमेरिका पर निर्भरता एक बड़ा मुद्दा बन गया है
क्या यह स्थिति स्थायी होगी?
विश्लेषकों का मानना है कि सम्पूर्ण रूप से अमेरिका पर निर्भरता बनी रहना शायद भविष्य की नीति नहीं बन सकती। यूरोपीय देशों की स्वावलंबी रणनीतियाँ जैसे:
📌 ऊर्जा स्रोतों में विविधता
तकनीकी और रक्षा उत्पादन में वृद्धि
📌 क्षेत्रीय सहयोग और साझेदारी
.📌 स्वतंत्र निर्णय लेने वाले आर्थिक मॉडल
ये सभी संकेत देते हैं कि यूरोप अमेरिका से ‘निर्भर’ होने की स्थिति को समय के साथ कम करना चाहता है।
यह वैश्विक भू-राजनीति में एक बड़ी बदलाव की दिशा में संकेत है जिसमें कई देशों की भूमिकाएँ, साझेदारियाँ और सुरक्षा ढांचे दोबारा परिभाषित हो रहे हैं।
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