संघ शताब्दी पर आधारित बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘शतक’ के पहले गीत ‘भगवा है अपनी पहचान’ के भव्य लॉन्च समारोह में जहाँ राष्ट्रभाव, संस्कृति और इतिहास की गंभीर चर्चा हुई, वहीं मशहूर गायक सुखविंदर सिंह ने अपने सहज, सरल और हास्यपूर्ण अंदाज़ से पूरे माहौल को आत्मीयता से भर दिया। गीत लॉन्च के दौरान उनसे जब यह सवाल पूछा गया कि उन्होंने इस गीत को गाने के लिए कितनी फीस ली, तो उनका जवाब सुनकर सभागार में मुस्कान फैल गई।
सुखविंदर सिंह ने हँसते हुए कहा,
“मुझे तो बस चॉकलेट मिली है।”
उनका यह जवाब केवल एक मज़ाक नहीं था, बल्कि इसके पीछे छिपी थी उनकी स्मृतियों, संस्कारों और भावनात्मक जुड़ाव की एक गहरी कहानी, जिसने इस गीत को उनके लिए एक साधारण प्रोजेक्ट से कहीं अधिक बना दिया।
बचपन की यादों से जुड़ा है संघ और चॉकलेट का रिश्ता- सुखविंदर
अपने बयान को आगे बढ़ाते हुए सुखविंदर सिंह ने अपने बचपन के दिनों को याद किया। उन्होंने बताया कि वे पंजाब में जिस मोहल्ले में रहते थे, वहाँ उनके घर के ठीक सामने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा लगती थी। बचपन में वे अक्सर वहाँ जाया करते थे।
“शाखा में आने वाले लोग मुझसे कहते थे—कोई गाना सुना दो,” सुखविंदर सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा। “और जब मैं गा देता था, तो बदले में मुझे चॉकलेट मिलती थी।”
उनकी यह स्मृति न केवल एक मासूम बचपन की झलक थी, बल्कि यह भी दर्शाती थी कि संघ की शाखाएँ कैसे स्थानीय समाज, बच्चों और युवाओं से सहज रूप से जुड़ी रहती थीं। सुखविंदर सिंह के लिए यह अनुभव किसी मंचीय प्रदर्शन या पेशेवर करियर की शुरुआत नहीं, बल्कि आनंद और अपनत्व से जुड़ा एक सरल क्षण था।
‘शतक’ का गीत और वही पुरानी भावना
सुखविंदर सिंह ने आगे बताया कि जब फिल्म ‘शतक’ की टीम उनके पास गीत लेकर पहुँची, तो उन्हें वही पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। उन्होंने मज़ाकिया अंदाज़ में टीम से कहा,
“गाने के बदले मुझे बस चॉकलेट दे देना।”
यह सुनकर वहाँ मौजूद लोग हँस पड़े, लेकिन इस मज़ाक में भी एक गहरी भावना छिपी थी। सुखविंदर सिंह के लिए यह गीत केवल एक पेशेवर असाइनमेंट नहीं था, बल्कि उनके बचपन, संस्कारों और स्मृतियों से जुड़ा एक भावनात्मक अनुभव था। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस गीत को गाना उनके लिए सम्मान और सेवा की तरह था, न कि किसी आर्थिक सौदे की तरह।
राष्ट्रसेवा की भावना से गाया गया गीत
इससे पहले भी सुखविंदर सिंह कई बार कह चुके हैं कि ‘भगवा है अपनी पहचान’ उनके लिए एक विशेष गीत है। उनका मानना है कि हर कलाकार के जीवन में कुछ ऐसे प्रोजेक्ट आते हैं, जिन्हें वह दिल से करता है, न कि सिर्फ पेशे के तौर पर।
उन्होंने कहा था,
“यह गीत मेरे लिए सिर्फ एक पेशेवर काम नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा है। मैंने इसे पूरे दिल से गाया है।”
उनकी यह भावना गीत में भी स्पष्ट रूप से सुनाई देती है। उनकी आवाज़ में जो ऊर्जा, गर्व और भावनात्मक गहराई है, वह श्रोता को सीधे राष्ट्रभाव से जोड़ देती है।
मंच पर हल्कापन, विचारों में गहराई – सुखविंदर
गीत लॉन्च का कार्यक्रम अपने आप में एक गंभीर और ऐतिहासिक अवसर था। आरएसएस के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी द्वारा गीत का लोकार्पण किया गया, और फिल्म ‘शतक’ के माध्यम से संघ की 100 वर्षों की यात्रा को परदे पर लाने की बात हुई।
ऐसे गंभीर माहौल में सुखविंदर सिंह का यह हल्का-फुल्का बयान कार्यक्रम में मानवीय स्पर्श जोड़ने वाला साबित हुआ। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि राष्ट्र और संस्कृति से जुड़ी बातें केवल गंभीर भाषणों में ही नहीं, बल्कि सरल स्मृतियों और आत्मीय अनुभवों में भी बसती हैं।
कलाकार और संस्कार का संबंध
सुखविंदर सिंह का यह किस्सा इस बात को भी रेखांकित करता है कि कलाकार का व्यक्तित्व केवल मंच पर गाए गए गीतों से नहीं बनता, बल्कि उसके संस्कार, परिवेश और बचपन के अनुभव भी उसमें गहराई जोड़ते हैं।
संघ की शाखा में चॉकलेट के बदले गाना गाने वाला वह बच्चा, आज देश के सबसे प्रभावशाली गायकों में से एक है, और वही भावनात्मक सादगी आज भी उसके भीतर जीवित है।
‘शतक’ : इतिहास, विचार और मानवीय कहानियों की फिल्म – सुखविंदर
फिल्म ‘शतक’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 1925 में नागपुर में स्थापना से लेकर आज तक की 100 वर्षों की यात्रा को दर्शाती है। यह फिल्म केवल ऐतिहासिक घटनाओं का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि उन असंख्य छोटे-बड़े मानवीय अनुभवों को भी सामने लाने का प्रयास है, जिनसे संघ की विचारधारा बनी और आगे बढ़ी।
सुखविंदर सिंह का यह चॉकलेट वाला किस्सा भी उसी मानवीय पक्ष का एक उदाहरण है, जो संघ और समाज के बीच के सहज संबंध को दर्शाता है।
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