नई दिल्ली, 24 फरवरी 2026: दिल्ली–मेरठ के बीच नमो भारत Regional Rapid Transit System (RRTS) लॉन्च हो चुका है और यह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के परिवहन के भविष्य को नई दिशा दे रहा है। लेकिन इस प्रगतिशील प्रोजेक्ट के बावजूद, राजधानी के भीतरी इलाकों में रहने वाले लाखों Commuters के लिए रोज़ाना आने-जाने की परेशानी अभी भी बनी हुई है। विशेषज्ञों के मुताबिक राज्यक्षेत्र में रीजनल कनेक्टिविटी को प्राथमिकता देना अच्छा है, लेकिन लोकल ट्रैफिक और यातायात समाधान पर अभी भी काफी काम बाकी है।
नमो कॉरिडोर: दूरी घटाई, समय बचाया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में 82 किमी लंबा नमो भारत RRTS कॉरिडोर लॉन्च किया है, जो साराय काले खां (दिल्ली) से मेरठ (उप्र) तक फैला हुआ है। अब एक रैपिड ट्रेन से दिल्ली से मेरठ का सफ़र लगभग 55–60 मिनट में पूरा किया जा सकता है — जो पहले सड़क मार्ग पर कई घंटों में होता था।
यह परियोजना इतनी तेज़ है कि ट्रायल रन में 82 किमी की दूरी लगभग 40 मिनट में पूरी हुई थी, और ट्रेन की टॉप स्पीड 159 किमी/घंटा तक पहुँचने की क्षमता रखती है।
RRTS न केवल मेरठ तक यात्रा समय को कम करता है बल्कि यह एनसीआर के कई हिस्सों में बेहतर कनेक्टिविटी भी प्रदान करता है, जैसे गाज़ियाबाद, साहिबाबाद और न्यू अशोक नगर। कटौती हुई दूरी से अब कर्मचारियों, छात्रों और व्यवसायियों को आमने-सामने शहरों में जाना-आना पहले से बहुत आसान हो गया है।
लेकिन समस्या क्या है? — दिल्ली के अंदर का सफ़र
हालांकि RRTS ने मेरठ तक सफ़र आसान कर दिया है, वास्तविक समस्या वहीँ है जहाँ लोग दिल्ली के भीतर रहते हैं। उदाहरण के लिए नरेला, कापसहेड़ा, बवाना, नागलोई जैसे इलाकों में रहने वाले Commuters को आज भी दिल्ली के मध्य भाग तक पहुंचने में लगभग 2 घंटे (या उससे अधिक) समय लगता है।
इसका मुख्य कारण है:
दिल्ली के भीतर हाई-स्पीड और अच्छी कनेक्टिविटी का अभाव
सड़क पर ट्रैफिक जाम, खासकर सुबह-शाम पीक आवर्स में
लोकलपब्लिक ट्रांसपोर्ट का सीमित नेटवर्क
सबसिडी और सुविधाओं की असमानता
विशेषज्ञों के अनुसार, दिल्ली में लोकल कनेक्टिविटी और रीजनल कनेक्टिविटी के बीच संतुलन अब सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। अगर किसी व्यक्ति को नरेला से नई दिल्ली तक आना है, तो आने-जाने में लगभग 4 घंटे तक का समय रोज़ाना खर्च हो सकता है — जो सामाजिक और आर्थिक रूप से बहुत महंगा साबित हो रहा है।
लोकल यातायात की कठिनाइयाँ
दिल्ली की सड़कों पर प्रतिदिन वाहनों की संख्या क्षमता से कहीं अधिक है। ट्रैफिक ज़ाम का औसत समय कई इलाक़ों में 60–90 मिनट तक पहुँच चुका है। अधिकांश क्षेत्र अभी भी तेज़ सार्वजनिक परिवहन के दायरे से बाहर हैं। इसका परिणाम यह है कि:
Commuters रोज़ाना बहुत अधिक समय और ऊर्जा खर्च कर रहे हैं।
लोगों की उत्पादकता और जीवन-गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
आर्थिक असमानता और अवसरों का फ़र्क बढ़ रहा है।
ट्रैफिक की धीमी गति का एक प्रमुख उदाहरण यह है कि विकासशील शहरों की तुलना में दिल्ली की औसत सड़क की गति लगभग 10 किमी/घंटा तक गिर गई है, जबकि विकसित शहरों में यह लगभग 30 किमी/घंटा होती है। ऐसे में दिल्ली के भीतर लोकल ट्रांसपोर्ट समाधान को प्राथमिकता देना अति आवश्यक बताया जा रहा है।
सार्वजनिक परिवहन और भविष्य की तैयारियाँ – नमो कॉरिडोर
अब सवाल यह उठता है कि क्या दिल्ली में लोकल सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क — जैसे मेट्रो, लोकल ट्रेनों या RRTS के लिंक — को और बेहतर बनाया जा सकता है?
विशेषज्ञों की राय में:
Delhi Metro के विस्तार को और तेज़ी से पूरा करना चाहिए
लोकल बेस्ट बस नेटवर्क का आधुनिकीकरण जरुरी है
RRTS stations को बेहतर last-mile connectivity देना चाहिए
इंटीरियर इलाकों में मिनी-रैपिड ट्रांजिट प्रोजेक्ट्स लाए जाएँ
इन सभी उपायों से न केवल दिल्ली-मेरठ दूरी बल्कि दिल्ली के भीतरी हिस्सों का सफ़र भी आसान बन सकता है।
सामाजिक-आर्थिक प्रभाव– नमो कॉरिडोर
नमो कॉरिडोर के आने से ना केवल यात्राएँ सरल हुई हैं, बल्कि कुछ बड़े सामाजिक-आर्थिक परिणाम भी दिखाई दे रहे हैं:
Meerut और NCR के आसपास के इलाकों में रिहायशी और व्यवसायिक अवसर बढ़े हैं।
लोग अब Meerut में रहकर Delhi में नौकरी करने के विकल्प पर विचार कर रहे हैं।
RRTS से रोज़मर्रा की बोझिल यात्राएँ कम होने से लोगों की जीवन-शैली में सुधार भी देखा जा रहा है।
लेकिन साथ ही कुछ यात्रियों ने लागत को लेकर चिंता भी जताई है — जैसे दैनिक राउंड-टिप पर खर्च लगभग ₹400+ हो रहा है, जो हर रोज़ के commuters के लिए महँगा हो सकता है।
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