थाईलैंड-कंबोडिया के बीच जारी सीमा विवाद और हिंसक संघर्ष के बीच, दोनों देशों के शीर्ष राजनयिकों ने चीन के बीजिंग और युन्नान में दो दिवसीय वार्ता की शुरुआत कर दी है, जिसका उद्देश्य हाल में दोनों देशों के बीच हुए संघर्षविराम (Ceasefire) को स्थायी और मजबूती प्रदान करना है। यह बैठक एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम है, जो दक्षिण-पूर्व एशिया में तनाव को कम करने और क्षेत्रीय शांति को बढ़ावा देने की दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
पृष्ठभूमि: सीमा विवाद और संघर्ष की वजह – थाईलैंड–कंबोडिया
थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा विवाद दशकों पुराना है, लेकिन यह विवाद दिसंबर 2025 में तीव्र संघर्ष में बदल गया, जिसमें दोनों पक्षों के सैनिक और नागरिकों के बीच भयंकर झड़पें हुईं। इन झड़पों में कम से कम 100 से अधिक लोगों की मौत हुई, और आधा मिलियन से अधिक लोग विस्थापित हो गए।
संघर्ष का मूल कारण दोनों देशों के विवादित सीमा क्षेत्रों पर नियंत्रण और सुरक्षा के मसले हैं, विशेष रूप से ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले क्षेत्रों के कारण दोनों ओर की सेनाओं और स्थानीय आबादी के बीच बढ़ते तनाव ने स्थिति को जटिल बना दिया है।
पहला संघर्षविराम समझौता जुलाई में मलायेशिया और संयुक्त राज्य अमेरिका के दबाव से हुआ था, लेकिन वह लंबे समय तक टिक नहीं सका और सीमा पर हिंसा फिर से भड़क उठी।
संघर्षविराम समझौता और उसके मूल तत्व – थाईलैंड–कंबोडिया
थाईलैंड–कंबोडिया 28 दिसंबर को नई जारी संघर्षविराम संधि पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें दोनों पक्षों ने सीमा पर युद्ध गतिविधियों को रोकने और त्वरित संघर्षविराम को लागू करने पर सहमति व्यक्त की। इस संधि के महत्वपूर्ण बिंदु इस प्रकार हैं:
सीमा पर सैनिकों के समन्वित रूप से किसी भी नई कार्रवाई से बचने का निर्णय
72 घंटे की निगरानी अवधि, ताकि संघर्षविराम के पालन की पुष्टि की जा सके
थाईलैंड द्वारा 18 कंबोडियाई सैनिकों को रिहा करने की सहमति, जिन्हें जुलाई से हिरासत में रखा गया था
विस्थापित नागरिकों को सुरक्षित रूप से अपने घर लौटने की अनुमति
चीन की मध्यस्थता: भूमिका और प्रयास
इस संघर्षविराम समझौते और वार्ता में मध्यस्थता की भूमिका निभाई है और दोनों देशों को बातचीत के लिए मंच उपलब्ध कराने की पेशकश की है। बीजिंग की कोशिश है कि वह न केवल संघर्षविराम को लागू करे, बल्कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संवाद को मजबूत कर स्थायी शांति सुनिश्चित करे।
चीन के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि वह संघर्षविराम समझौते का स्वागत करता है और इसके सफल क्रियान्वयन के लिए आवश्यक परिस्थितियों को सृजित करने को तैयार है। इसी कड़ी में उसने मुख्य वार्ता स्थल के रूप में युन्नान प्रांत को चुना, जहाँ दोनों पक्षों के विदेशी मंत्रियों के साथ द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय बैठकें आयोजित की जा रही हैं।
संघर्षविराम के समर्थन के लिए 20 मिलियन युआन (लगभग 2.8 मिलियन अमेरिकी डॉलर) का आपातकालीन मानवीय सहायता पैकेज भी घोषित किया थाईलैंड–कंबोडिया , जिसमें खाद्य सामग्री, तंबू, कंबल और अन्य राहत सामग्री शामिल है, ताकि विस्थापित लोगों को पुनर्वास और राहत प्रदान की जा सके।
राजनयिक वार्ता के प्राथमिक उद्देश्य – थाईलैंड–कंबोडिया
राजनयिक बैठक का मुख्य लक्ष्य संघर्षविराम को सिर्फ एक सीमित अवधि का समझौता न बनाए रखना, बल्कि इसे दीर्घकालिक और स्थायी शांति की रूपरेखा में बदलना है।थाईलैंड–कंबोडिया
मुख्य विषयों में शामिल हैं:
सीमा पर स्थिर निगरानी व्यवस्था
दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता को नियमित रूप से जारी रखना
ASEAN (आसियान) के साथ समन्वय बढ़ाना
सीमा पर विनियमित सुरक्षा व्यवस्था और आतंकवादी गतिविधियों से बचाव
विस्थापित नागरिकों की सुरक्षा और पुनर्वास प्रक्रिया को तेज करना
थाईलैंड के विदेश मंत्री सिहासक फुआंगकेओव ने कहा कि इस बैठक का उद्देश्य न केवल युद्धविराम को बनाए रखना है, बल्कि चीन को यह संदेश देना भी है कि वह संघर्ष को फिर से शुरू न करने के लिए कंबोडिया पर सकारात्मक दबाव डाले। उन्होंने चीन को सिर्फ मध्यस्थ नहीं, बल्कि स्थायी शांति के निर्माण में एक सकारात्मक भूमिका निभाने वाला साझेदार भी बताया।
अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और भविष्य की राह – थाईलैंड–कंबोडिया
चीन के अलावा, संयुक्त राज्य अमेरिका और मलायेशिया भी इस संघर्षविराम प्रक्रिया में पहले शामिल रहे हैं और उन्होंने सीमा विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के लिए कूटनीतिक समर्थन प्रदान किया है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी संघर्षविराम के लिए दबाव बनाया था ताकि दोनों देशों के बीच संकट को तेजी से रोका जा सके।
हालांकि दोनों देशों के बीच लंबे समय तक चले विवाद का हल अभी भी स्थायी रूप से नहीं हुआ है, लेकिन यह बैठक और संघर्षविराम समझौता एक सकारात्मक संकेत है कि दोनों पक्ष बातचीत के रास्ते पर आगे बढ़कर समाधान की दिशा में काम करने को तैयार हैं।
आगामी दिनों में यह देखने की संभावना है कि क्या दोनों देशों की सरकारें सीमा नियंत्रण, सुरक्षा व्यवस्था और स्थानीय नागरिकों के पुनर्वास के लिए नई रणनीतियाँ अपनाती हैं या नहीं। यदि संघर्षविराम सफल होता है, तो यह दक्षिण-पूर्व एशिया में क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
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