पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की राजनीति तेज़ गति से गरमाती जा रही है। राज्य की सत्ता पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) चौथी बार कब्ज़ा बनाए रखने की तैयारी में है, तो दूसरी ओर BJP (भाजपा) भी जमीनी स्तर पर अपनी चुनावी तैयारियों को सक्रिय कर चुकी है। इस बार की लड़ाई न केवल राजनीतिक सत्ता के लिए है, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई के रूप में भी देखी जा रही है।
टीएमसी की रणनीति: ‘बुआ-भतीजा’ की चुनौती
तृणमूल कांग्रेस (TMC) की चुनावी रणनीति का एक महत्वपूर्ण केंद्रबिंदु पार्टी नेतृत्व की नई युवा ऊर्जा है। राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव समेत कई वरिष्ठ नेताओं की कोशिश है कि टीएमसी की नयी पीढ़ी — विशेष रूप से अभिषेक बनर्जी — चुनावी माहौल में अपनी पकड़ मजबूत करें और पार्टी को चौथी बार सत्ता में वापस लाएँ।
इस ढांचे के कारण ही मीडिया और राजनीतिक विश्लेषक टीएमसी के नेतृत्व को ‘बुआ-भतीजा’ (ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी) की जोड़ी के रूप में देख रहे हैं, जिसका उद्देश्य है पार्टी की नैया को चुनावी तूफ़ान से पार लगाना।
TMC का दावा है कि पश्चिम बंगाल की अस्मिता, संस्कृति और सामाजिक संतुलन को वह बेहतर तरीके से संरक्षित कर सकती है। पार्टी की ओर से कहा जा रहा है कि भाजपा चुनाव में हिंदू-मुस्लिम और सांप्रदायिक मुद्दों को उछालकर जनता को भटका रही है। टीएमसी नेताओं का कहना है कि बंगाल की जनता धार्मिक विभाजन नहीं चाहती, बल्कि विकास, रोजगार और सामाजिक समरसता को प्राथमिकता देती है।
BJP का जमीनी अभियान और रणनीति
वहीं दूसरी तरफ BJP पूरी तरह से जमीनी अभियान (Ground Campaign) को सक्रिय कर चुकी है। पार्टी का मानना है कि बंगाल में यह चुनाव ‘अस्तित्व की लड़ाई’ है और इस बार वह टीएमसी को सत्ता से बेदखल करने के इरादे को लेकर मैदान में क़दम रख रही है।
BJP नेता दावा कर रहे हैं कि बंगाल में “हिंदुत्व खतरे में है”, महिलाओं और बहुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भाजपा ही बेहतर तरीके से निभा सकती है और बंगाल को विकास की राह पर ले जाने का काम कर सकती है। पार्टी यह संदेश दे रही है कि ममता सरकार ने महिलाओं, व्यापार, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर नकारात्मक परिणाम दिए हैं, और अब जनता बदलाव चाहती है।
BJP अपनी रणनीति को और सुदृढ़ करने के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को 8 जनवरी से पश्चिम बंगाल में दो दिवसीय दौरे पर भेज रही है ताकि पार्टी की तैयारियों को और गति दी जा सके और बूथ-स्तर पर संगठन मजबूत किया जा सके।
भाजपा की कोशिश है कि हिन्दुत्व, सुरक्षा, विकास और रोजगार जैसे मुद्दों पर वह मतदाताओं से समर्थन जुटाए। इसके साथ ही पार्टी ने बांग्लादेश से जुड़े सुरक्षा और अल्पसंख्यक समुदायों के मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया है, यह संदेश देने के लिए कि बंगाल की सांस्कृतिक पहचान और सुरक्षा को भाजपा बेहतर तरीके से संभाल सकती है।
मुख्य राजनीतिक मुद्दे और मतदाताओं की प्राथमिकताएँ – BJP
पश्चिम बंगाल की राजनीति में कई संवेदनशील मुद्दे उभर रहे हैं जो चुनावी माहौल को प्रभावित कर रहे हैं।
एक प्रमुख मुद्दा है मतदाता सूची संशोधन (Special Intensive Review — SIR)। इस प्रक्रिया को लेकर सियासत तेज़ रही है। TMC का आरोप है कि SIR के जरिये NRC लागू करने की कोशिश की जा रही है, जिससे बंगाल में मतदाता समुदायों में असुरक्षा और भ्रम पैदा हो रहा है। TMC नेताओं का कहना है कि यह भाजपा-सरकार की रणनीति है ताकि राज्य की सामाजिक संरचना को बदला जा सके।
भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि SIR प्रक्रिया एक मानक और संवैधानिक प्रक्रिया है और इसका लक्ष्य केवल मतदाता सूची को साफ़ और स्पष्ट रखना है। भाजपा का कहना है कि यह किसी समुदाय के खिलाफ नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मजबूती के लिए आवश्यक है।
राजकीय और राष्ट्रीय दलों की भूमिका
हालाँकि टीएमसी और भाजपा इस चुनाव की मुख्य प्रतिस्पर्धी पार्टियाँ हैं, लेकिन अन्य पार्टियाँ भी चुनावी रणनीति तैयार कर रही हैं। कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल के लिए भी पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की है ताकि पार्टी पूरी तरह चुनावी रण में सक्रिय रहे।
इसके अलावा राज्य में कुछ क्षेत्रीय और छोटे दल भी अपने आधार को मजबूत करने की कोशिश में हैं, जिससे यह चुनाव और भी रोचक और प्रतिस्पर्धात्मक बन गया है।
BJP के नेताओं का बयान और विश्लेषण
BJP के वरिष्ठ नेताओं में से एक गौरव वल्लभ ने दावा किया है कि जनता टीएमसी को केवल 25 सीटों तक सीमित कर देगी, जो राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
यही नहीं, पहले के चुनावों में भाजपा के नेता दिलीप घोष ने कहा था कि अगला चुनाव टीएमसी के लिए आख़िरी साबित होगा और बंगाल में भाजपा की ताकत बढ़ेगी, यह दर्शाता है कि भाजपा नेतृत्व इस चुनाव को जीतने के लिए पूरी रणनीति और विश्वास के साथ मैदान में है।
चुनावी माहौल और जनता की प्रतिक्रिया
राज्य के राजनीतिक माहौल में यह चुनाव सामाजिक मुद्दों से आगे बढ़कर विकास और पहचान के संघर्ष जैसा बनता जा रहा है। मतदाताओं की प्राथमिकताएँ भी विविध हैं — कुछ विकास और रोजगार को महत्व दे रहे हैं, तो कुछ सांस्कृतिक और सामाजिक सुरक्षा पर ज़ोर दे रहे हैं। इसके अलावा, बूथ-स्तर पर जमीनी स्तर की राजनीति भी चुनावी परिणाम को प्रभावित करने वाली एक निर्णायक फ़ैक्टर बन रही है।
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