आईने के सामने खड़े होकर अपने चेहरे को देखना और छोटी-छोटी कमियों को ठीक करने की कोशिश करना आम बात है। लेकिन अगर आप बार-बार आईने में अपना चेहरा देखते हैं और हर बार कोई नई कमी नजर आने लगती है, तो यह आदत धीरे-धीरे आपकी परेशानी बढ़ा सकती है।
मनोविज्ञान से जुड़ी रिसर्च के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति अपने चेहरे की उन खूबियों पर ज्यादा ध्यान देता है जिन्हें वह पसंद नहीं करता, तो उसके आत्मविश्वास, अपनी सुंदरता को लेकर संतुष्टि और आत्मसम्मान पर बुरा असर पड़ सकता है।
कुछ मामलों में यह आदत बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर (BDD) नाम की मानसिक स्वास्थ्य समस्या से भी जुड़ी हो सकती है। इसमें व्यक्ति अपने शरीर या चेहरे की किसी कमी को लेकर जरूरत से ज्यादा परेशान रहता है, भले ही वह कमी दूसरों को दिखाई न देती हो या बहुत मामूली हो।
बार-बार आईना देखने से क्यों बढ़ सकती है परेशानी?
‘बॉडी इमेज’ जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, जब लोगों को अपने चेहरे की उस विशेषता पर ध्यान देने के लिए कहा गया जो उन्हें पसंद नहीं थी, तो उनकी अपने रूप को लेकर संतुष्टि, आकर्षक महसूस करने की भावना और आत्मसम्मान में कमी देखी गई।
विशेषज्ञों के अनुसार, जब कोई व्यक्ति बार-बार अपनी कमियों पर ध्यान देता है, तो उसका ध्यान उन्हीं चीजों पर टिकने लगता है। इससे वह अपनी शक्ल को लेकर पहले से ज्यादा असंतुष्ट महसूस कर सकता है।
2011 में ‘बिहेवियर रिसर्च एंड थेरेपी’ जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में भी पाया गया कि आईने में खुद को देखने के बाद BDD से पीड़ित लोगों और सामान्य लोगों, दोनों में बेचैनी और खुद की कमियों पर ध्यान देने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि आईना देखना अपने आप में नुकसानदायक है। परेशानी तब बढ़ सकती है, जब कोई व्यक्ति बार-बार अपनी शक्ल जांचने लगे और इससे उसकी चिंता कम होने के बजाय बढ़ती जाए।
क्या है बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर (BDD)?
बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर एक मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। इसमें व्यक्ति अपने चेहरे या शरीर की किसी कथित कमी को लेकर लगातार परेशान रहता है। वह उस कमी को दूसरों की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ा समझ सकता है।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को लग सकता है कि उसकी नाक बहुत बड़ी है, चेहरे पर दाग-धब्बे बहुत ज्यादा हैं या उसके बाल तेजी से पतले हो रहे हैं। जबकि दूसरे लोगों को यह कमी नजर नहीं आती या वे इसे बहुत मामूली मानते हैं।
इस समस्या से परेशान व्यक्ति बार-बार आईने में खुद को देख सकता है, दूसरों से अपनी शक्ल के बारे में पूछ सकता है, अपनी तुलना दूसरे लोगों से कर सकता है या सामाजिक कार्यक्रमों में जाने से बच सकता है।
कैसे पहचानें कि यह सामान्य आदत नहीं है?
कभी-कभी आईने में अपना चेहरा देखना या किसी कमी को लेकर परेशान होना सामान्य है। लेकिन अगर यह व्यवहार आपकी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
कुछ संकेत इस प्रकार हैं:
- बार-बार आईने में चेहरा या शरीर जांचना।
- किसी खास कमी के बारे में लगातार सोचना।
- अपनी शक्ल की तुलना दूसरे लोगों से करते रहना।
- दूसरों से बार-बार पूछना कि आप अच्छे दिख रहे हैं या नहीं।
- अपनी शक्ल को लेकर शर्मिंदगी महसूस करना और लोगों से मिलने से बचना।
- चेहरे या शरीर की कथित कमी के कारण पढ़ाई, काम या रिश्तों पर असर पड़ना।
इनमें से कुछ लक्षण होने का मतलब यह नहीं कि आपको BDD है। सही आकलन मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ ही कर सकता है।
सोशल मीडिया और फिल्टर कैसे बढ़ा रहे हैं दबाव?
आज सोशल मीडिया पर फिल्टर वाली सेल्फी, एडिट की गई तस्वीरें और खूबसूरती के तय मानक लोगों की सोच को प्रभावित कर सकते हैं। लगातार ऐसी तस्वीरें देखने से कुछ लोग अपनी असली शक्ल की तुलना एडिट की गई तस्वीरों से करने लगते हैं।
इससे उन्हें अपनी त्वचा, नाक, होंठ, चेहरे के आकार या बालों को लेकर असंतोष हो सकता है। कुछ लोग अपनी तस्वीरों को बार-बार एडिट करते हैं या सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से पहले कई बार अपनी शक्ल जांचते हैं।
हालांकि, सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले हर व्यक्ति को BDD नहीं होता। लेकिन जिन लोगों को पहले से अपनी शक्ल को लेकर चिंता रहती है, उनके लिए लगातार तुलना करना परेशानी बढ़ा सकता है।
भारत में भी सामने आ रहे हैं BDD के मामले
भारत में कॉलेज छात्रों, युवाओं और मेडिकल छात्रों पर किए गए कुछ अध्ययनों में BDD के लक्षणों की मौजूदगी दर्ज की गई है। अलग-अलग अध्ययनों में इसकी दर अलग रही है, क्योंकि लोगों की उम्र, अध्ययन के तरीके और जांच के मानक अलग-अलग थे।
इसलिए इन आंकड़ों को पूरे भारत में BDD से प्रभावित लोगों की सटीक संख्या नहीं माना जा सकता। फिर भी ये अध्ययन बताते हैं कि शरीर और चेहरे की छवि से जुड़ी परेशानियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
क्या बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर का इलाज संभव है?
हां, BDD का इलाज संभव है। सही समय पर मदद मिलने से व्यक्ति अपनी चिंताओं और बार-बार जांच करने की आदत को नियंत्रित करना सीख सकता है।
इसके इलाज में मुख्य रूप से दो तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं:
1. कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT)
इस थेरेपी में व्यक्ति को अपनी शक्ल के बारे में बार-बार आने वाले नकारात्मक विचारों को पहचानने और उनसे निपटने में मदद मिलती है। साथ ही, आईना बार-बार देखने, दूसरों से अपनी शक्ल की पुष्टि मांगने और तुलना करने जैसे व्यवहारों को कम करने की रणनीतियां सिखाई जाती हैं।
2. दवाइयां
कुछ मामलों में डॉक्टर SSRI श्रेणी की दवाइयां लिख सकते हैं। इनका इस्तेमाल लक्षणों की गंभीरता और व्यक्ति की स्थिति के आधार पर किया जाता है। इन्हें केवल डॉक्टर की सलाह पर ही लेना चाहिए।
अगर आपको लगता है कि अपनी शक्ल को लेकर चिंता आपके रोजमर्रा के जीवन पर असर डाल रही है, तो मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।
आईना देखें, लेकिन खुद की कमियां ढूंढने में न उलझें
आईने में अपना चेहरा देखना एक सामान्य गतिविधि है। समस्या तब पैदा हो सकती है, जब आप बार-बार अपनी शक्ल की जांच करने लगें और इससे आपकी चिंता बढ़ती जाए।
याद रखें, हर व्यक्ति के चेहरे और शरीर में कुछ न कुछ अलग होता है। खूबसूरती का कोई एक निश्चित मानक नहीं है। अपनी तुलना सोशल मीडिया की एडिट की गई तस्वीरों से करने के बजाय अपनी सेहत, आत्मविश्वास और मानसिक सुकून पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है।
अगर अपनी शक्ल को लेकर चिंता आपके जीवन को प्रभावित कर रही है, तो इसे केवल आदत समझकर नजरअंदाज न करें। सही समय पर विशेषज्ञ की मदद लेने से स्थिति में सुधार हो सकता है।



