देश में जब भी कोई बड़ा कोर्ट फैसला आता है, राजनीति उसमें अपने आप घुस जाती है। मालेगांव ब्लास्ट केस में एनआईए अदालत के हालिया फैसले ने फिर से राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। कोर्ट ने सबूतों के अभाव में सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया है। इसी फैसले पर कांग्रेस सांसद ने प्रतिक्रिया दी है, और कहा है — “हिंदू आतंकवादी होते हैं, ऐसा कहना गलत था, लेकिन इस मामले का राजनीतिक इस्तेमाल जरूर हुआ।”
आइए समझते हैं पूरा मामला, अदालत का फैसला और नेताओं की प्रतिक्रिया।
क्या है मालेगांव ब्लास्ट केस?
मालेगांव ब्लास्ट 29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव शहर में हुआ था। यह धमाका एक बाइक में लगाए गए विस्फोटक से किया गया था, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई थी और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।
शुरुआती जांच में मामले की दिशा कुछ और थी, लेकिन बाद में जांच का जिम्मा एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) को दिया गया। एनआईए ने इस मामले में कई लोगों को आरोपी बनाया, जिनमें साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित और अन्य शामिल थे।
अदालत ने सभी को किया बरी-मालेगांव
एनआईए की विशेष अदालत ने 28 जुलाई 2025 को इस मामले में सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी आरोपों को साबित करने के लिए पुख्ता सबूत पेश नहीं कर सकी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और न ही कोई मज़हब हिंसा को बढ़ावा देता है। अदालत ने यह भी कहा कि इस केस में जिन लोगों पर आरोप लगे, उनके खिलाफ सीधा कोई सबूत नहीं मिला जिससे उन्हें दोषी ठहराया जा सके।
कांग्रेस सांसद का बयान: पहले से था अंदाज़ा
कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस नेता रऊफ चौधरी ने बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा, “हमें पहले से ही अंदाज़ा था कि सबूतों की कमी के चलते यह फैसला आ सकता है। लेकिन यह भी सच है कि पूरे देश में एक वक्त ऐसा माहौल बनाया गया था, जिसमें ‘हिंदू आतंकवाद’ जैसा शब्द चलन में आ गया। जो भी हो, किसी भी धर्म को आतंकवाद से जोड़ना निंदनीय है।”
उनका यह बयान राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। जहां भाजपा इसे कांग्रेस की विफलता बता रही है, वहीं कांग्रेस इसे न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान बता रही है।
‘हिंदू आतंकवाद’ शब्द पर विवाद
इस केस को लेकर “हिंदू आतंकवाद” शब्द पहली बार देश की राजनीति में गूंजा था। तब यूपीए सरकार के कुछ नेताओं ने इस शब्द का इस्तेमाल किया था, जो बाद में बीजेपी और संघ से जुड़े संगठनों ने मुद्दा बनाकर कांग्रेस पर तीखा हमला किया था।
बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस ने राजनीतिक लाभ के लिए हिंदू समाज को बदनाम करने की कोशिश की थी, जबकि कांग्रेस का कहना है कि वह सिर्फ जांच एजेंसियों की रिपोर्ट पर आधारित बातें कह रही थी।
राजनीति गरमाई, बयानबाज़ी तेज
कोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक दलों में तीखी बयानबाज़ी शुरू हो गई है।
बीजेपी नेताओं ने कहा कि न्याय ने उन निर्दोषों को राहत दी है, जिन्हें सालों तक परेशान किया गया।
वहीं कांग्रेस कह रही है कि अदालत का फैसला स्वीकार्य है, लेकिन किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पूरी जांच और साक्ष्यों का विश्लेषण जरूरी होता है।
कई सामाजिक संगठनों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है और कहा कि यह न्याय प्रणाली की जीत है। साथ ही उन लोगों की रिहाई भी एक बड़ी बात है जो वर्षों तक मानसिक और सामाजिक तनाव में जी रहे थे
क्या होगा अब आगे?
अब सवाल उठता है कि क्या इस मामले में असली दोषी कभी पकड़ में आएंगे? क्या जांच एजेंसियां फिर से इस केस को खोलेंगी? या यह मामला भी देश के कई अन्य पुराने मामलों की तरह फाइलों में दफन होकर रह जाएगा?
साथ ही यह भी देखने लायक होगा कि क्या राजनीतिक दल इस मुद्दे को चुनावी हथियार बनाएंगे या फिर देश में कानून और न्याय की प्रक्रिया को शांतिपूर्वक आगे बढ़ने देंगे।
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