बिहार विधानसभा में 24 जुलाई 2025 को एक बार फिर राजनीति का पारा चढ़ गया। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच तीखी बहस के दौरान आरोप-प्रत्यारोप के ऐसे दौर चले कि सदन का माहौल तनावपूर्ण हो गया। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में रहे पूर्व उपमुख्यमंत्री और राजद नेता तेजस्वी यादव, जिन्होंने भाजपा विधायक पर गंभीर आरोप लगाए। वहीं, उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी, जो सोशल मीडिया और मीडिया हेडलाइन्स का हिस्सा बन गई।
तेजस्वी यादव और तेज प्रताप विवाद की शुरुआत
गुरुवार को बिहार विधानसभा में चर्चा के दौरान राजद और भाजपा के विधायकों के बीच बहस गरमा गई। इसी बीच तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि एक भाजपा विधायक ने उन्हें “मां-बहन की गालियां” दीं। उन्होंने इसे न सिर्फ निजी अपमान बताया, बल्कि इसे लोकतांत्रिक मूल्यों की अवहेलना करार दिया। तेजस्वी का बयान था:
“बीजेपी विधायक ने सदन में मां-बहन की गाली दी। अगर यही भाषा यहां चलेगी, तो लोकतंत्र की गरिमा कैसे बचेगी?”
तेजस्वी का ये आरोप न केवल मीडिया की सुर्खियों में आ गया, बल्कि राजनीतिक हलकों में भी हलचल मचा दी।
तेज प्रताप की तीखी टिप्पणी
घटना के बाद तेज प्रताप यादव ने भी प्रतिक्रिया दी और बयान दिया:
“अगर मैं वहां मौजूद होता तो सम्राट चौधरी का बुखार छुड़ा देता।”
यह बयान काफी आक्रामक और भावनात्मक था। तेज प्रताप का कहना था कि अगर वह मौके पर होते, तो बीजेपी नेता को सबक सिखाते। उनका इशारा था कि वे अपने भाई का अपमान सहन नहीं कर सकते।
तेज प्रताप का यह बयान राजनीतिक शालीनता की सीमाओं से परे माना गया और सोशल मीडिया पर इसकी जमकर चर्चा हुई। विरोधी दलों ने इस बयान को ‘गुंडागर्दी की मानसिकता’ बताया, वहीं राजद समर्थकों ने इसे आत्मसम्मान की लड़ाई कहा।
भाजपा की प्रतिक्रिया
बीजेपी ने तेजस्वी के आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि तेजस्वी और तेज प्रताप दोनों ही विपक्षी दबाव से घबराए हुए हैं और जनता का ध्यान भटकाने के लिए झूठे आरोप लगा रहे हैं।
बीजेपी विधायक सम्राट चौधरी, जिन पर अप्रत्यक्ष रूप से तेज प्रताप ने बयान दिया, ने कहा:
“राजद को अपनी हार साफ दिख रही है। इसलिए वे अब मुद्दों से हटकर भावनात्मक आरोप लगा रहे हैं। विधानसभा में जो भी कहा गया, वह रिकॉर्ड में है और जांच कराई जा सकती है।”
विधानसभा की गरिमा पर सवाल
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या देश की विधानसभाओं में बहस अब मुद्दों पर नहीं, बल्कि निजी हमलों और गालियों तक सिमटती जा रही है?
जहां एक ओर जनता उम्मीद करती है कि उसके निर्वाचित प्रतिनिधि समस्याओं का समाधान करेंगे, वहीं दूसरी ओर नेताओं की ये भाषा और व्यवहार लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को धूमिल कर रही है।
चुनावी रणनीति या भावनात्मक प्रतिक्रिया?
बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। ऐसे में इस तरह की घटनाएं राजद और भाजपा के बीच बढ़ती चुनावी गर्मी का संकेत भी देती हैं। राजद नेतृत्व जहां खुद को जनता के “सम्मान की लड़ाई” का प्रतीक बना रहा है, वहीं भाजपा इसे एक सोची-समझी रणनीति बता रही है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि तेजस्वी और तेज प्रताप यादव का यह आक्रामक रुख एक तरफ उनकी नेतृत्व शैली को दर्शाता है, तो दूसरी ओर इससे राज्य की राजनीति में ध्रुवीकरण भी तेज हो सकता है।
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