नई दिल्ली: दिल्ली का भारत मंडपम इन दिनों ग्लोबल साउथ की बड़ी कूटनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दूसरे दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच अहम द्विपक्षीय बैठक हुई। करीब सात साल बाद भारत आए जिनपिंग की यह मुलाकात भारत-चीन संबंधों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
7 साल बाद भारत पहुंचे शी जिनपिंग
शी जिनपिंग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में चौथी बार भारत आए हैं। इससे पहले वे 2014 में अहमदाबाद, 2016 में गोवा और 2019 में महाबलीपुरम पहुंचे थे।
हालांकि, उनकी पिछली यात्राओं के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बढ़ा। 2017 में डोकलाम विवाद और 2020 में गलवान हिंसा के बाद भारत-चीन संबंध काफी खराब हुए थे।
अब बदलते वैश्विक हालात के बीच दोनों देश रिश्तों को दोबारा स्थिर और व्यावहारिक बनाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं।
भारत मंडपम में मोदी-जिनपिंग की बैठक
भारत मंडपम में हुई बैठक में प्रधानमंत्री मोदी के साथ विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भी मौजूद रहे। चीन की ओर से शी जिनपिंग के साथ वरिष्ठ अधिकारी और प्रतिनिधिमंडल शामिल हुआ।
बैठक में दोनों देशों के बीच कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने माना कि रिश्तों को लंबे समय के नजरिए से आगे बढ़ाना जरूरी है।
इन मुद्दों पर बनी सहमति
बैठक में दोनों देशों के बीच संबंधों को बेहतर बनाने के लिए कई बिंदुओं पर जोर दिया गया—
- भारत-चीन संबंधों को रणनीतिक और लंबे समय के नजरिए से आगे बढ़ाया जाएगा।
- दोनों देशों के मतभेदों को विवाद में बदलने से बचा जाएगा।
- सीमा विवाद का उचित और स्वीकार्य समाधान खोजने की कोशिश होगी।
- व्यापार और आर्थिक संबंधों को मजबूत किया जाएगा।
- दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क और आवाजाही बढ़ाई जाएगी।
- व्यापार से जुड़ी चिंताओं को दूर करने की कोशिश होगी।
- क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग बढ़ाया जाएगा।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सीमा पर शांति और स्थिरता भारत-चीन संबंधों को सामान्य बनाने के लिए बेहद जरूरी है। उन्होंने दोनों देशों के बीच हुए समझौतों और सहमतियों को लागू करने पर भी जोर दिया।
पृष्ठभूमि में दिखी रामेश्वरम मंदिर की तस्वीर
मोदी और जिनपिंग की मुलाकात के दौरान पीछे रामेश्वरम के रामनाथस्वामी मंदिर के गलियारे की तस्वीर भी नजर आई। इसे भारत की सांस्कृतिक विरासत और ग्लोबल साउथ में भारत की बढ़ती भूमिका के प्रतीक के तौर पर देखा गया।
ब्रिक्स मंच पर भारत, चीन और रूस की मौजूदगी को भी बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
पहलगाम हमले पर ब्रिक्स का सख्त रुख
ब्रिक्स के घोषणा पत्र में पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की गई है। इसमें आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का समर्थन किया गया।
घोषणा पत्र में आतंकी फंडिंग रोकने, संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने और आतंकवाद के मुद्दे पर दोहरे मानदंड नहीं अपनाने की बात कही गई है।
इसे चीन के रुख में बदलाव के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है। हालांकि, घोषणा पत्र में पाकिस्तान का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया।
अभी भी बनी हुई हैं दो बड़ी चुनौतियां
भारत और चीन के बीच रिश्ते सुधारने की कोशिश जरूर हो रही है, लेकिन कई चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं।
पहली चुनौती LAC पर शांति और स्थिरता की है। भारत लगातार कहता रहा है कि सीमा पर शांति के बिना दोनों देशों के रिश्ते पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकते।
दूसरी बड़ी चुनौती व्यापार घाटा है। भारत चीन से होने वाले ज्यादा आयात और कम निर्यात को लेकर चिंतित है। नई दिल्ली चाहती है कि भारतीय सामान को चीनी बाजार में ज्यादा अवसर मिलें।
इसके अलावा क्वाड में भारत की भूमिका और पाकिस्तान को लेकर चीन का रुख भी दोनों देशों के बीच अविश्वास की वजह बने हुए हैं।
क्या रिश्तों में नई शुरुआत होगी?
मोदी और शी जिनपिंग की यह मुलाकात इस बात का संकेत देती है कि दोनों देश टकराव के बजाय बातचीत के रास्ते को आगे बढ़ाना चाहते हैं।
सीमा विवाद और व्यापार जैसे मुद्दे अभी भी चुनौती बने हुए हैं, लेकिन दोनों पक्षों का मानना है कि मतभेदों को रिश्तों पर हावी नहीं होने देना चाहिए।
अब आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान बनी यह कूटनीतिक गर्मजोशी भारत-चीन के बीच स्थायी भरोसे और बेहतर संबंधों में बदल पाती है या नहीं।
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