हिंदू धर्म में संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखी जीवन के लिए कई व्रत रखे जाते हैं। इनमें जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत को बेहद कठिन माना जाता है। यह व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है।
जितिया व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान के लिए रखती हैं। यह व्रत तीन दिनों तक चलने वाली परंपरा से जुड़ा है और इसमें निर्जला उपवास रखने की मान्यता है। ऐसे में अक्सर सवाल उठता है कि संतान माता-पिता दोनों की होती है, फिर यह व्रत सिर्फ मां ही क्यों रखती हैं? आइए जानते हैं इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं।
मां के जितिया व्रत रखने के पीछे क्या मान्यता है?
धार्मिक और लोक मान्यताओं के अनुसार, मां और बच्चे के बीच गहरा भावनात्मक और आत्मिक संबंध माना जाता है। मां बच्चे को जन्म देने से पहले करीब नौ महीने तक गर्भ में रखती है। इसलिए मातृत्व को त्याग, ममता और सुरक्षा से जोड़ा जाता है।
मान्यता है कि मां द्वारा रखा गया कठिन व्रत और उसका संकल्प संतान की सुरक्षा और लंबी उम्र के लिए किया जाता है। इसी वजह से जितिया का व्रत माताओं के लिए विशेष माना जाता है।
क्या जितिया में पिता के लिए भी कोई नियम है?
जितिया व्रत में निर्जला उपवास रखने की परंपरा मुख्य रूप से महिलाओं के लिए बताई जाती है। पिता के लिए इस दिन निर्जला व्रत रखना अनिवार्य नहीं माना जाता।
हालांकि, पिता पूजा की तैयारियों और धार्मिक अनुष्ठानों में सहयोग कर सकते हैं। परिवार और संतान की भलाई के लिए संकल्प लेना और व्रत रखने वाली मां का सहयोग करना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
व्रत के दौरान सात्विक वातावरण बनाए रखने पर भी जोर दिया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, परिवार के सदस्यों को मांस, मदिरा और अन्य तामसिक चीजों से दूर रहना चाहिए।
जितिया की कथा जीमूतवाहन से जुड़ी है
जितिया व्रत की प्रमुख पौराणिक कथा राजा जीमूतवाहन से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, जीमूतवाहन बहुत दयालु और परोपकारी थे। उन्होंने एक नाग बालक की जान बचाने के लिए खुद को गरुड़ के सामने बलि के रूप में प्रस्तुत कर दिया।
जीमूतवाहन के त्याग और साहस से प्रभावित होकर गरुड़ ने उन्हें जीवनदान दिया। साथ ही उन्होंने नागों की बलि न लेने का वचन दिया। इसी वजह से जीमूतवाहन को संतान की रक्षा करने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है।
चील और सियारिन की कथा भी है प्रसिद्ध
जितिया व्रत से जुड़ी एक अन्य लोककथा चील और सियारिन की है। मान्यता के अनुसार, दोनों ने जीमूतवाहन की पूजा देखकर व्रत रखने का फैसला किया।
चील ने पूरी श्रद्धा के साथ व्रत पूरा किया, जबकि सियारिन भूख-प्यास सहन नहीं कर पाई और उसने व्रत तोड़ दिया। कथा के अनुसार, अगले जन्म में चील की संतानें लंबी उम्र वाली हुईं, जबकि सियारिन की संतानें अल्पायु रहीं।
इसी लोक मान्यता के कारण माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुरक्षा की कामना से जितिया का कठिन निर्जला व्रत रखती हैं।
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