भारत में अब पीले और भूरे आलू के साथ बैंगनी आलू की भी चर्चा हो रही है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत आने वाले केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI), शिमला ने ‘कुफरी जामुनिया’ जैसी बैंगनी आलू की किस्म विकसित की है। यह आलू अपने अनोखे रंग और इसमें मौजूद प्राकृतिक पोषक तत्वों के कारण खास माना जा रहा है।
वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस तरह की पौष्टिक फसलें लोगों के आहार में पोषक तत्वों की कमी दूर करने में मदद कर सकती हैं। आइए जानते हैं कि बैंगनी आलू की खासियत क्या है और इससे किसानों को क्या फायदा हो सकता है।
कहां से आया बैंगनी आलू?
बैंगनी आलू की पारंपरिक किस्में दक्षिण अमेरिका के पेरू और बोलीविया जैसे क्षेत्रों में लंबे समय से उगाई जाती रही हैं। भारतीय मौसम और मिट्टी को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने भी बैंगनी आलू की उपयुक्त किस्में विकसित की हैं।
‘कुफरी जामुनिया’ ऐसी ही एक किस्म है। इसके अलावा ‘कुफरी नीलिमा’ भी बैंगनी आलू की एक किस्म है। इन किस्मों की खेती की संभावनाओं से किसानों को आलू की खेती में नए विकल्प मिल सकते हैं।
क्या होती है ‘छिपी हुई भूख’?
छिपी हुई भूख यानी हिडन हंगर ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति पर्याप्त खाना तो खाता है, लेकिन उसके शरीर को जरूरी विटामिन और खनिज नहीं मिल पाते।
शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आयरन, जिंक, कैल्शियम, आयोडीन और विटामिन जैसे पोषक तत्व जरूरी हैं। इनकी कमी से खून की कमी, रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने और बच्चों के विकास पर बुरा असर पड़ने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
बच्चों और महिलाओं में पोषण की कमी एक बड़ी चुनौती है। इसलिए रोजाना खाए जाने वाले खाद्य पदार्थों में पोषक तत्व बढ़ाना महत्वपूर्ण माना जाता है।
भारत में कुपोषण की स्थिति क्या है?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में पोषण की कमी अब भी एक गंभीर समस्या है।
- बच्चों में स्टंटिंग: लगभग 35.5% बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से कम लंबाई के थे।
- वेस्टिंग: लगभग 19.3% बच्चे अपनी लंबाई के अनुपात में कम वजन के थे।
- कम वजन: लगभग 32.1% बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से कम वजन के थे।
- संतुलित आहार: 6 से 23 महीने के बच्चों में केवल लगभग 11.3% बच्चों को न्यूनतम स्वीकार्य आहार मिल रहा था।
ये आंकड़े NFHS-5 के हैं। इनसे पता चलता है कि बच्चों के लिए पर्याप्त और संतुलित भोजन उपलब्ध कराना कितना जरूरी है।
बैंगनी आलू की क्या हैं खासियतें?
बैंगनी आलू का रंग इसमें मौजूद एंथोसायनिन नाम के प्राकृतिक रंगद्रव्य के कारण होता है। यह एक प्रकार का एंटीऑक्सीडेंट है।
1. एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर
एंथोसायनिन शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव तनाव से होने वाले नुकसान से बचाने में मदद कर सकता है। हालांकि, केवल बैंगनी आलू खाने से कैंसर या हृदय रोग से बचाव की गारंटी नहीं मिलती।
2. पोषण बढ़ाने में मददगार
बैंगनी आलू की कुछ किस्मों में एंथोसायनिन और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं। हालांकि, विटामिन सी, आयरन और जिंक की मात्रा किस्म के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए कुफरी जामुनिया में इनकी सामान्य आलू से तुलना करने के लिए प्रमाणित आंकड़ों की जरूरत है।
3. रोजमर्रा के भोजन में शामिल करना आसान
आलू भारतीय रसोई में पहले से ही काफी लोकप्रिय है। ऐसे में पौष्टिक किस्मों को भोजन में शामिल करना आसान हो सकता है। फिर भी शरीर को सभी जरूरी पोषक तत्व देने के लिए दाल, हरी सब्जियां, फल और दूसरे पौष्टिक खाद्य पदार्थ खाना भी जरूरी है।
किसानों को कैसे होगा फायदा?
बैंगनी आलू किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक नया अवसर बन सकता है। इसका अनोखा रंग और संभावित पोषण संबंधी फायदे इसे खास बाजारों में लोकप्रिय बना सकते हैं।
फूड प्रोसेसिंग कंपनियां भी रंगीन आलू से चिप्स, स्नैक्स और दूसरे खाद्य उत्पाद बनाने में दिलचस्पी दिखा सकती हैं। हालांकि, किसानों को इससे कितना लाभ मिलेगा, यह बाजार की मांग, उत्पादन लागत, पैदावार और बिक्री मूल्य पर निर्भर करेगा।
इसकी खेती सामान्य आलू जैसी हो सकती है, लेकिन किसानों को बीज की उपलब्धता, स्थानीय जलवायु और खेती से जुड़े संस्थानों की सलाह के अनुसार ही इसकी खेती शुरू करनी चाहिए।
क्या बैंगनी आलू कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में मदद करेगा?
बैंगनी आलू कृषि और पोषण के क्षेत्र में एक उपयोगी विकल्प बन सकता है। इसमें मौजूद प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट और इसकी खेती की संभावनाएं इसे खास बनाती हैं।
हालांकि, कुपोषण और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दूर करने के लिए केवल एक फसल पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। संतुलित आहार, पोषण संबंधी जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाएं भी उतनी ही जरूरी हैं।
अगर बैंगनी आलू की उन्नत किस्मों की खेती बड़े पैमाने पर होती है और किसानों को अच्छा बाजार मिलता है, तो यह खेती और पोषण दोनों के लिहाज से फायदेमंद साबित हो सकता है।



