लद्दाख की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच एक ऐसा मंदिर है, जहां लोग फूल और माला नहीं, बल्कि पानी की बोतलें चढ़ाते हैं। यह अनोखा मंदिर मनाली-लेह नेशनल हाईवे पर करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर गाटा लूप्स के 19वें मोड़ पर बना है। मंदिर के बाहर प्लास्टिक की हजारों बोतलें जमा हैं, जो दूर से किसी पहाड़ जैसी दिखाई देती हैं।
बाइक राइडर्स और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यहां अब तक 1 लाख से ज्यादा पानी की बोतलें जमा हो चुकी हैं। लेकिन इन बोतलों के पीछे एक दर्दनाक कहानी जुड़ी हुई है।
कैसे हुई इस परंपरा की शुरुआत?
स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, इस कहानी की शुरुआत साल 1998-99 के आसपास हुई थी। बताया जाता है कि उस समय भारी बर्फबारी के दौरान एक ट्रक गाटा लूप्स के रास्ते में खराब हो गया था। ट्रक में मौजूद एक हेल्पर की तबीयत खराब थी।
ऐसे में ड्राइवर हेल्पर को ट्रक के पास छोड़कर मदद लेने के लिए पास के गांव चला गया। लेकिन खराब मौसम और बर्फबारी के कारण उसे वापस आने में करीब पांच दिन लग गए। जब वह लौटा, तब तक हेल्पर की भूख और प्यास से मौत हो चुकी थी।
पानी मांगने वाले भूत की कहानी
इस घटना के बाद इस रास्ते से गुजरने वाले कई ड्राइवरों ने अजीब अनुभव होने का दावा किया। लोगों का कहना था कि रात के समय यहां एक साया दिखाई देता है, जो गाड़ियों को रोककर पानी मांगता है।
मान्यता थी कि अगर कोई उसे पानी नहीं देता, तो आगे रास्ते में उसकी गाड़ी खराब हो जाती है या उसके साथ कोई हादसा हो जाता है।
इसी डर और उस मृत हेल्पर की आत्मा की शांति के लिए साल 2001 में यहां एक छोटा मंदिर बनाया गया। इसके बाद से यात्रियों और ट्रक ड्राइवरों ने सुरक्षित सफर की कामना करते हुए मंदिर में पानी की बोतलें चढ़ानी शुरू कर दीं।
आस्था के साथ बढ़ रहा है प्लास्टिक प्रदूषण
समय के साथ यह परंपरा लद्दाख के लिए पर्यावरण की बड़ी समस्या बन गई है। हर साल हजारों पर्यटक यहां पहुंचते हैं और पानी की बोतलें चढ़ाकर चले जाते हैं। कुछ लोग सिगरेट और तंबाकू भी छोड़ देते हैं।
तेज हवाओं के कारण ये प्लास्टिक की बोतलें आसपास की पहाड़ियों और वादियों में फैल रही हैं। इससे लद्दाख के प्राकृतिक वातावरण और वन्यजीवों को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ रहा है।
पर्यावरण को बचाने के लिए प्रशासन और पर्यावरण प्रेमी लोगों से अपील कर रहे हैं कि वे मंदिर में प्लास्टिक की बोतलें न छोड़ें। इसके बजाय थोड़ा पानी पत्थरों पर छिड़ककर आगे बढ़ें। इससे इस खूबसूरत पहाड़ी इलाके को प्लास्टिक प्रदूषण से बचाया जा सकता है।



