भारतीय सनातन परंपरा में सोलह श्रृंगार को केवल सुंदरता से नहीं जोड़ा जाता, बल्कि इनके पीछे धार्मिक और पारंपरिक मान्यताएं भी बताई जाती हैं। शादी के बाद महिलाओं के पैरों में पहनी जाने वाली बिछिया भी इन्हीं श्रृंगारों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
अक्सर सवाल पूछा जाता है कि बिछिया आमतौर पर चांदी की ही क्यों पहनी जाती है और ज्योतिष में इसका संबंध किन ग्रहों से बताया गया है। आइए जानते हैं इससे जुड़ी पारंपरिक मान्यताएं।
चांदी को चंद्रमा और शुक्र से जोड़ा जाता है
वैदिक ज्योतिष में अलग-अलग धातुओं का संबंध अलग-अलग ग्रहों से माना जाता है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार चांदी का संबंध चंद्रमा और शुक्र ग्रह से माना जाता है।
चंद्रमा को मन, भावनाओं और मानसिक शांति से जोड़ा जाता है, जबकि शुक्र को प्रेम, सौंदर्य और वैवाहिक सुख का कारक माना जाता है।
ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार, पैरों में चांदी धारण करने से सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और मानसिक तनाव को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, ये धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताएं हैं, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं।
राहु-केतु से भी जुड़ी है बिछिया की मान्यता
पारंपरिक ज्योतिष में शरीर के अलग-अलग हिस्सों को ग्रहों से जोड़कर देखा जाता है। पैरों और शरीर के निचले हिस्से पर केतु के प्रभाव की मान्यता है, जबकि राहु को भ्रम और अचानक आने वाली परेशानियों से जोड़ा जाता है।
कुछ ज्योतिषीय परंपराओं में माना जाता है कि चांदी राहु-केतु के प्रभाव को शांत करने वाली धातु है। इसी वजह से पैरों में चांदी की बिछिया पहनने की परंपरा को ऊर्जा संतुलन से जोड़कर देखा जाता है।
पैर की दूसरी उंगली में ही क्यों पहनते हैं बिछिया?
परंपरा के अनुसार बिछिया पैर के अंगूठे के पास वाली दूसरी उंगली में पहनी जाती है। इसके पीछे स्वास्थ्य और धार्मिक, दोनों तरह की मान्यताएं बताई जाती हैं।
आयुर्वेद और पारंपरिक एक्यूप्रेशर से जुड़ी मान्यताओं में कहा जाता है कि पैर की दूसरी उंगली की कुछ नसों का संबंध प्रजनन तंत्र और शरीर के अन्य हिस्सों से माना जाता है। बिछिया के हल्के दबाव को इसी वजह से लाभकारी बताया जाता है।
हालांकि, इन दावों को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाता।
सोने की बिछिया क्यों नहीं पहनते?
हिंदू धार्मिक परंपराओं में पैरों में सोना पहनने को आमतौर पर उचित नहीं माना जाता। सोने को देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु से जुड़ी पवित्र धातु माना जाता है।
इसी धार्मिक मान्यता के कारण सोने के आभूषणों को शरीर के ऊपरी हिस्से में पहनने और पैरों में चांदी के आभूषण पहनने की परंपरा विकसित हुई।
बिछिया टूट जाए या खो जाए तो क्या माना जाता है?
लोक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार बिछिया का टूटना या खो जाना शुभ नहीं माना जाता। ऐसी स्थिति में इसे बदलकर नई चांदी की बिछिया पहनने की सलाह दी जाती है।
इसी तरह, पारंपरिक मान्यता है कि अपनी पहनी हुई बिछिया किसी दूसरी महिला को नहीं देनी चाहिए।
दोनों पैरों में बिछिया पहनने की परंपरा
परंपरा के अनुसार विवाहित महिलाएं दोनों पैरों में बिछिया पहनती हैं और दोनों पैरों की संबंधित उंगलियों में इसे समान रूप से पहनने की सलाह दी जाती है।
कुल मिलाकर, बिछिया पहनने की परंपरा धर्म, संस्कृति, ज्योतिष और लोक मान्यताओं से जुड़ी हुई है। चांदी की बिछिया को लेकर बताए जाने वाले ग्रहों और स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं, इसलिए इन्हें वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखना चाहिए।
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