दिल्ली में कई ऐसे ऐतिहासिक स्मारक हैं, जिनका इतिहास आज भी पूरी तरह साफ नहीं है। पुराने समय के इन स्मारकों से जुड़ी कई बातें सिर्फ लोककथाओं और मौखिक इतिहास के जरिए सामने आती हैं।
ऐसा ही एक रहस्यमयी स्मारक दक्षिण दिल्ली के साउथ एक्सटेंशन इलाके में मौजूद है, जिसे छोटे खान और बड़े खान के मकबरे के नाम से जाना जाता है।
इन दोनों मकबरों के बारे में कोई पुख्ता लिखित जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालांकि, इनके निर्माण की शैली और पुराने इतिहास के आधार पर इनके लोधी काल से जुड़े होने की बात कही जाती है।
15वीं शताब्दी में लोधी काल के दौरान बना होने का अनुमान
दिल्ली के इतिहास पर जानकारी साझा करने वाले स्वतंत्र पत्रकार रे खन्ना के मुताबिक, छोटे खान और बड़े खान के नाम से पहचाने जाने वाले ये दोनों मकबरे करीब 15वीं शताब्दी के बताए जाते हैं। इनकी बनावट और वास्तुकला लोधी काल के दूसरे स्मारकों से काफी मिलती-जुलती है।
दोनों मकबरों की संरचना लगभग एक जैसी है। हालांकि, इनमें से एक मकबरा आकार में बड़ा है, इसलिए उसे बड़े खान का मकबरा और दूसरे को छोटे खान का मकबरा कहा जाता है।
आखिर किसके हैं ये दोनों मकबरे?
सबसे बड़ा रहस्य यही है कि इन मकबरों में आखिर किसे दफनाया गया था। इस बारे में कोई स्पष्ट लिखित प्रमाण नहीं मिलता है।
मौखिक इतिहास में अलग-अलग दावे किए जाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि बड़ा मकबरा किसी शिक्षक का और छोटा मकबरा उसके शिष्य का है। वहीं एक दूसरी मान्यता के अनुसार बड़ा मकबरा पिता और छोटा मकबरा उसके बेटे का हो सकता है।
हालांकि, इन दावों की कोई पुख्ता पुष्टि नहीं हुई है। इतिहासकारों और जानकारों के अनुसार इतना जरूर माना जाता है कि जिन लोगों के लिए ये मकबरे बनाए गए होंगे, वे लोधी काल में महत्वपूर्ण पदों पर रहे होंगे। यही वजह हो सकती है कि उनके लिए इतने भव्य मकबरे बनाए गए।
घरों के बीच छिपे हैं दोनों मकबरे
छोटे खान और बड़े खान के ये मकबरे दक्षिण दिल्ली के साउथ एक्सटेंशन-1 के ब्लॉक डी में स्थित हैं। आसपास कई घर बने होने के कारण ये स्मारक सड़क से आसानी से दिखाई नहीं देते।
यहां पहुंचने के लिए साउथ एक्सटेंशन मेट्रो स्टेशन तक जा सकते हैं। स्टेशन से मकबरों तक पहुंचने में करीब 20 से 25 मिनट लग सकते हैं। इसके लिए रिक्शा या स्थानीय परिवहन का सहारा लिया जा सकता है।
सातों दिन जा सकते हैं देखने
बताई गई जानकारी के अनुसार, ये स्मारक सप्ताह के सातों दिन खुले रहते हैं और यहां प्रवेश के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाता। स्मारक सुबह करीब 7:30 बजे खुलता है और शाम 7 बजे तक खुला रहता है।
दिल्ली के बीचों-बीच मौजूद ये दोनों मकबरे आज भी अपने इतिहास को लेकर रहस्य बने हुए हैं। इनके बारे में पुख्ता जानकारी सामने आने तक शिक्षक-शिष्य या पिता-पुत्र से जुड़ी कहानियां केवल मौखिक मान्यताएं ही मानी जाएंगी।
यह भी पढ़े- जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल के लिए पंचक में खरीद सकते हैं लकड़ी का झूला? जानें क्या कहते हैं नियम



