नंदी और भगवान शिव की पौराणिक कथा
सावन का दूसरा सोमवार और सोम प्रदोष व्रत है। सावन में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। शिव परिवार के साथ भगवान शिव के प्रिय गण नंदी महाराज की पूजा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
शिव मंदिरों में नंदी की मूर्ति हमेशा शिवलिंग के सामने होती है। धार्मिक मान्यता है कि नंदी के जरिए भक्तों की प्रार्थना भगवान शिव तक पहुंचती है। इसी वजह से कई श्रद्धालु नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहते हैं।

कैसे बने नंदी भगवान शिव के प्रिय?
पौराणिक कथा के अनुसार, शिलाद नाम के एक ऋषि भगवान शिव के परम भक्त थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की।
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। कुछ समय बाद जब शिलाद ऋषि खेत में हल चला रहे थे, तभी उन्हें धरती से एक दिव्य बालक मिला। ऋषि ने इसे भगवान शिव का आशीर्वाद माना और उसका नाम नंदी रखा।
नंदी ने की कठोर तपस्या
नंदी बचपन से ही धार्मिक और भगवान शिव के भक्त थे। एक दिन कुछ संत शिलाद ऋषि के आश्रम पहुंचे और उन्होंने बताया कि नंदी की आयु कम है। यह सुनकर शिलाद ऋषि बहुत दुखी हुए।
लेकिन नंदी ने हिम्मत नहीं छोड़ी। उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या शुरू कर दी। नंदी की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके सामने प्रकट हुए।
महादेव ने नंदी को अमर होने का दिया वरदान
महादेव ने नंदी को अजर-अमर होने का वरदान दिया और उन्हें अपने गणों का प्रमुख बना दिया। इसके बाद नंदी भगवान शिव के सबसे प्रिय भक्तों और उनके अभिन्न अंग के रूप में पूजे जाने लगे।
शिवलिंग के सामने ही क्यों बैठे होते हैं नंदी?
नंदी केवल भगवान शिव के वाहन ही नहीं, बल्कि उनके परम भक्त और गणाध्यक्ष भी माने जाते हैं। मंदिरों में उनका मुख शिवलिंग की ओर होना उनकी अटूट भक्ति, समर्पण और निष्ठा का प्रतीक माना जाता है।
मान्यता है कि नंदी हमेशा भगवान शिव पर अपनी नजर बनाए रखते हैं। यह भक्तों को संदेश देता है कि जीवन में अपने आराध्य और लक्ष्य के प्रति एकाग्र और समर्पित रहना चाहिए।
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