दूर्वाष्टमी व्रत 18 सितंबर 2026 को रखा जाएगा। हिंदू धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन दूर्वा से भगवान गणेश की पूजा करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और वंश की वृद्धि होती है।
कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने राजा युधिष्ठिर को दूर्वाष्टमी व्रत का महत्व बताया था। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से यह व्रत करता है, उसके परिवार और वंश की वृद्धि दूर्वा की तरह होती रहती है।
क्यों मनाई जाती है दूर्वाष्टमी?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दूर्वाष्टमी का व्रत करने से सुख-शांति, संतान सुख और संकटों से मुक्ति की कामना की जाती है। दूर्वा को पवित्र और शुभ माना गया है।
भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा चढ़ाने की परंपरा भी है। धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में गणपति को दो, तीन या पांच दूर्वा अर्पित करने का विधान बताया गया है।
दूर्वाष्टमी पर पूर्वविद्धा का समय
दिए गए पंचांग के अनुसार, पूर्वविद्धा दोपहर 1 बजे से शाम 6:23 बजे तक रहेगी।
कैसे हुई दूर्वा की उत्पत्ति?
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय देवताओं ने अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का मंथन किया था। उस समय भगवान विष्णु ने मंदराचल पर्वत को अपनी जंघा पर धारण किया था।
मंदराचल पर्वत के तेज घर्षण के कारण भगवान विष्णु के कुछ रोम टूटकर समुद्र में गिर गए। समुद्र की लहरों के साथ ये रोम धरती पर पहुंचे और वहां हरी और सुंदर दूर्वा के रूप में उत्पन्न हुए।
समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कलश को देवताओं ने दूर्वा के ऊपर रखा। उस दौरान अमृत की कुछ बूंदें भी दूर्वा पर गिर गईं। मान्यता है कि अमृत के स्पर्श से दूर्वा अजर-अमर हो गई। इसी वजह से दूर्वा को देवताओं के लिए भी पवित्र और पूजनीय माना गया।
देवताओं ने की थी दूर्वा की पूजा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवताओं ने भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी को दूर्वा की पूजा की थी। पूजा में गंध, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य, दही, अक्षत और माला के साथ कई प्रकार के फल अर्पित किए गए थे।
देवताओं ने दूर्वा की आराधना करते हुए संतान, सौभाग्य और सभी कार्यों में सफलता की कामना की।
महिलाओं के लिए भी विशेष माना गया है व्रत
धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवताओं की पत्नियों और अप्सराओं ने भी दूर्वा की पूजा की थी। मर्त्यलोक में वेदवती, सीता और दमयंती जैसी महिलाओं द्वारा भी दूर्वा की पूजा किए जाने का उल्लेख मिलता है।
मान्यता है कि श्रद्धा के साथ दूर्वा की पूजा करने और दान-पुण्य करने से सौभाग्य और मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद मिलता है।
दूर्वाष्टमी पर क्या करें?
दूर्वाष्टमी के दिन महिलाएं स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें और श्रद्धा के साथ दूर्वा की पूजा करें। इसके बाद अपनी क्षमता के अनुसार तिल से बनी वस्तुएं, गेहूं और सप्तधान्य आदि का दान करने की परंपरा बताई गई है।
ब्राह्मण को भोजन कराने का भी धार्मिक महत्व बताया गया है।
क्या है दूर्वाष्टमी का महत्व?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दूर्वाष्टमी का व्रत करने से संतान सुख, सौभाग्य, संपत्ति और परिवार की समृद्धि की कामना की जाती है। दूर्वा को वंश की वृद्धि और संतान के कल्याण का प्रतीक भी माना जाता है।
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है। NAv24news इन मान्यताओं की पुष्टि नहीं करता है। पूजा-व्रत से जुड़े नियमों के लिए अपने स्थानीय पंचांग और परिवार की परंपरा को प्राथमिकता दें।
डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और परंपराओं पर आधारित है। NAv24news किसी भी मान्यता या दावे की पुष्टि नहीं करता है। व्रत और पूजा से जुड़ी जानकारी अपनाने से पहले अपने स्थानीय पंचांग, परिवार की परंपरा और संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



