मिडिल ईस्ट में ईरान के हालिया कदम को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई के अंतिम विदाई कार्यक्रम को सिर्फ एक श्रद्धांजलि समारोह नहीं, बल्कि ताकत के प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस आयोजन के जरिए ‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ (प्रतिरोध की धुरी) का संदेश एक बार फिर दुनिया के सामने रखा गया है। ऐसे समय में, जब मिडिल ईस्ट लगातार संघर्ष और सैन्य तनाव से गुजर रहा है।
देखने में आया है कि ईरान सालों से फिलस्तीन के विद्रोही गुट हमास, लेबनान के हिज्बुल्लाह और यमन के हूती विद्रोहियों को सपोर्ट करता रहा है. इन्हें अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने टेरर ऑर्गेनाइजेशन घोषित किया हुआ है. ईरान अपने इन विद्रोही गुटों को एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस कहता है. इसमें इराक के कुछ गुट भी शामिल हैं. यह सभी हथियारबंद संगठन हैं.
हाल ही के हमलों और ईरान-गाजा वॉर के बाद यह माना जाने लगा था कि मिडिल ईस्ट के यह लड़ाकू संगठन कमजोर हो गए हैं. लेकिन इन विद्रोही गुटों के मौजूदगी ने पूरे जनाजे में खास चर्चा बटोरी है. हिज्बुल्लाह और हमास की तरफ से आए उनके नुमाइंदों ने बकायदा ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से भी मुलाकात की है.
मिडिल ईस्ट में इन विद्रोही गुटों की चुनौती कम नहीं
ईरान की ताकत रहे, हमास, हिजबुल्लाह और हूती से जुड़े लोग खामेनेई के जनाजे में शामिल हुए. यह सारे विद्रोही गुट हैं. इन्हें जियोपॉलिटिक्स में Tiple H कहा जाता है. इजरायल ने इन विद्रोही गुटों को कमजोर करने के लिए कई सैन्य ऑपरेशन चलाए हैं. इधर, अमेरिका और इजरायल दावा करते रहे हैं कि इस युद्ध में इन विद्रोही गुटों को काफी नुकसान पहुंचा है, लेकिन खामेनेई के अंतिम संस्कार में इनकी मौजूदगी ने अलग ही बयानगी पेश की है. यानी इनकी मौजूदगी से माना जा रहा है कि इजरायल के लिए मिडिल ईस्ट में इन विद्रोही गुटों की चुनौती कम नहीं हुई है.
