बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक ऐसे मामले में आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी, जो सिर्फ ₹1 ज्यादा कीमत पर कोल्ड ड्रिंक बेचने के आरोप से शुरू हुआ था और करीब 13 साल तक चलता रहा। कोर्ट ने पाया कि जिस व्यक्ति के खिलाफ केस चलाया गया, उसने वास्तव में कोल्ड ड्रिंक नहीं बेची थी। वह सिर्फ अपनी पत्नी के कहने पर बिल बना रहा था।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला 29 मार्च 2013 का है। लीगल मेट्रोलॉजी इंस्पेक्टर ने एक दुकान की जांच के दौरान 600 मिलीलीटर की Pepsi की बोतल खरीदी। बोतल पर MRP ₹25 लिखा था, लेकिन आरोप था कि इसके लिए ₹26 लिए गए और ₹26 का बिल भी दिया गया।
इसके बाद जुलाई 2013 में शिकायत दर्ज हुई और लांजा की न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने उस व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया। उस पर Legal Metrology (Packaged Commodities) Rules, 2011 के नियम 18(2) और 32(2) के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था।
मामला 13 साल तक कोर्ट में चलता रहा
व्यक्ति ने इस कार्रवाई को रत्नागिरी सेशंस कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन सितंबर 2014 में उसकी याचिका खारिज हो गई। इसके बाद उसने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने आखिरकार 29 जून 2026 को उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
कोर्ट ने केस क्यों रद्द किया?
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि कोल्ड ड्रिंक की बिक्री उस व्यक्ति ने नहीं, बल्कि उसकी पत्नी ने की थी। दुकान भी उसकी पत्नी की थी।
व्यक्ति की भूमिका सिर्फ इतनी थी कि पत्नी के कहने पर उसने बिक्री के बाद ₹26 का बिल तैयार किया था। कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ बिल बनाना अपने आप में उस सामान की बिक्री करना नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी पाया कि इंस्पेक्टर की अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि बोतल पत्नी की दुकान से और पत्नी द्वारा बेची गई थी। इसके बावजूद आपराधिक शिकायत सिर्फ पति के खिलाफ दर्ज की गई थी। पत्नी को आरोपी नहीं बनाया गया था।
बिल में तारीख बदलने पर भी कोर्ट ने उठाया सवाल
कोर्ट ने बिल में हुई ओवरराइटिंग पर भी ध्यान दिया। रिकॉर्ड के अनुसार बिल में 29 मार्च 2013 की तारीख को बदलकर 29 जून 2013 किया गया था। कोर्ट ने कहा कि इस ओवरराइटिंग से भी अभियोजन का मामला संदिग्ध होता है।
MRP से ज्यादा कीमत लेना फिर भी नियमों का उल्लंघन है
इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि दुकानदार MRP से ज्यादा कीमत पर पैकेज्ड सामान बेच सकते हैं। हाईकोर्ट का फैसला इस खास मामले में गलत व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई से जुड़ा था।
अदालत ने कहा कि Legal Metrology Rules का संबंधित प्रावधान उस व्यक्ति पर लागू होता है जो वास्तव में सामान की बिक्री करता है। इस मामले में रिकॉर्ड के अनुसार बिक्री पत्नी ने की थी, इसलिए पति के खिलाफ कार्रवाई का आधार नहीं बनता था।
गलत व्यक्ति के खिलाफ चला केस
हाईकोर्ट ने माना कि पति के खिलाफ चलाया गया मुकदमा गलत आधार पर और गलत दिशा में था। सिर्फ इसलिए किसी व्यक्ति को आपराधिक जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती कि वह दुकान मालिक का पति है या उसने बिक्री के बाद बिल बनाया है।
व्यक्ति ने इंस्पेक्टर पर ₹5,000 रिश्वत मांगने का आरोप भी लगाया था। हालांकि, कोर्ट का फैसला मुख्य रूप से इस बात पर आधारित रहा कि असल बिक्री किसने की थी और आरोपी की भूमिका क्या थी।



