हरियाली तीज के बाद आने वाली कजरी तीज या कजली तीज सुहागिन महिलाओं के लिए खास मानी जाती है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार समेत कई राज्यों में इसे सातूड़ी तीज और बड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है।
इस दिन विवाहित महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं। वहीं कुंवारी लड़कियां भी मनचाहा जीवनसाथी पाने की इच्छा से यह व्रत करती हैं। रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोला जाता है।
कजरी तीज कब है और शुभ मुहूर्त क्या है?
ज्योतिषाचार्या नीतिका शर्मा के अनुसार, इस बार कजरी तीज 31 अगस्त को मनाई जाएगी।
- तृतीया तिथि शुरू: 30 अगस्त, सुबह 9:36 बजे
- तृतीया तिथि समाप्त: 31 अगस्त, सुबह 8:50 बजे
- उदया तिथि के अनुसार: 31 अगस्त को कजरी तीज मनाई जाएगी।
नीमड़ी माता की पूजा कैसे करें?
कजरी तीज पर कई जगह नीमड़ी माता की पूजा करने की परंपरा है। पूजा के लिए सबसे पहले दीवार के पास नीमड़ी माता की स्थापना करें।
इसके बाद माता को जल और रोली अर्पित करें और अक्षत चढ़ाएं। दीवार पर मेहंदी और रोली की 13-13 बिंदियां अनामिका अंगुली से लगाई जाती हैं। वहीं काजल की 13 बिंदियां तर्जनी अंगुली से लगाने की परंपरा है।
इसके बाद नीमड़ी माता को मौली, मेहंदी, काजल, वस्त्र, फल और दक्षिणा अर्पित करें। पूजा के कलश पर रोली का टीका लगाकर मौली बांधें।
पूजा स्थल पर घी, दूध या पानी से बनाए गए छोटे कुंड के पास दीपक जलाएं। इसके बाद ककड़ी, नींबू, नीम की डाली, नथ और साड़ी के पल्ले का प्रतीकात्मक रूप से दर्शन करने की परंपरा भी बताई जाती है।
रात में चंद्रमा निकलने के बाद उन्हें अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है।
गाय की पूजा और सत्तू का भोग
कजरी तीज पर सत्तू का विशेष महत्व माना जाता है। गेहूं, चना और चावल के सत्तू से अलग-अलग तरह के पकवान बनाए जाते हैं।
व्रत खोलने से पहले गाय की पूजा करने की भी परंपरा है। आटे की रोटी या लोई पर गुड़ और भीगा हुआ चना रखकर गाय को खिलाया जाता है। इसके बाद प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
कजरी तीज के व्रत में किन बातों का रखें ध्यान?
कजरी तीज का व्रत आमतौर पर निर्जला रखा जाता है। हालांकि, गर्भवती महिलाओं और बीमार लोगों को अपनी सेहत को ध्यान में रखते हुए फलाहार के साथ व्रत रखने की सलाह दी जाती है।
अगर मौसम खराब होने के कारण चंद्रमा दिखाई न दे, तो स्थानीय परंपरा के अनुसार रात में आसमान की दिशा में अर्घ्य देकर व्रत खोलने की मान्यता है।
क्या है कजरी तीज की व्रत कथा?
पौराणिक कथा के अनुसार, एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। ब्राह्मणी ने कजरी तीज का व्रत रखा और पति से चने का सत्तू लाने को कहा।
आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण ब्राह्मण रात में साहूकार की दुकान पर पहुंच गया और वहां से सिर्फ सवा किलो चने का सत्तू लेकर आया। आवाज सुनकर साहूकार के लोगों ने उसे पकड़ लिया।
ब्राह्मण ने साहूकार को पूरी सच्चाई बताई और कहा कि उसकी पत्नी ने व्रत रखा है और वह सिर्फ सत्तू लेने आया था। तलाशी लेने पर उसके पास सत्तू के अलावा कुछ नहीं मिला।
ब्राह्मण की सच्चाई और उसकी पत्नी की श्रद्धा से साहूकार प्रभावित हुआ। उसने ब्राह्मणी को अपनी धर्म-बहन माना और उन्हें सत्तू, कपड़े, गहने, मेहंदी और धन दिया। इसके बाद परिवार ने विधि-विधान से कजली माता की पूजा की और मान्यता के अनुसार उनकी गरीबी दूर हो गई।
सुहागिन महिलाएं इन बातों का रखें ध्यान
कजरी तीज पर महिलाएं नए कपड़े पहनकर 16 श्रृंगार करती हैं। चूड़ी, बिंदी और मेहंदी लगाकर पूजा करने की परंपरा है।
इस दिन पति-पत्नी के बीच प्रेम और सम्मान बनाए रखने तथा किसी की निंदा या कटु शब्दों से बचने की सलाह दी जाती है। पूजा के बाद कई जगह महिलाएं मिलकर कजरी गीत गाती हैं और झूला झूलती हैं।
डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई पूजा विधि, मान्यताएं और धार्मिक बातें विभिन्न परंपराओं एवं ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं। NAV24news इन मान्यताओं की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी धार्मिक नियम या व्रत को अपनाने से पहले अपनी पारिवारिक परंपरा और संबंधित विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
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