National News | 24 अगस्त 2026 – शहरों में फुटपाथ तो बने होते हैं, लेकिन उन पर कब्जा, पार्किंग, दुकानें और दूसरे अवरोध आम लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन जाते हैं। अब इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब मांगा है। कोर्ट ने कहा कि फुटपाथ मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं और सड़क होने की स्थिति में पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित, स्पष्ट रूप से निर्धारित और अतिक्रमण मुक्त जगह होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की यह पहल उस पुराने आदेश की अगली कड़ी है, जिसमें शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि सुरक्षित और निर्धारित फुटपाथ पर चलने का अधिकार संविधान के तहत मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने यह अधिकार अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 से जोड़ा था और कहा था कि पैदल चलने वालों के अधिकार को मोटर वाहनों की आवाजाही पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से क्या कहा?
24 अगस्त को जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने फुटपाथ से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पक्षकार बनाया। कोर्ट अब यह जानना चाहता है कि उसके पहले दिए गए निर्देशों को जमीन पर लागू करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट का जोर इस बात पर है कि जहां सड़क है, वहां पैदल यात्रियों के लिए स्पष्ट रूप से अलग जगह होनी चाहिए। यह जगह केवल कागजों पर नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से लोगों के चलने के काम आनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि पैदल चलने वालों को सुरक्षित तरीके से चलने का भरोसा होना चाहिए। इसके लिए सबसे पहला कदम फुटपाथ की उचित पहचान और सीमांकन है।
फुटपाथ पर चलना मौलिक अधिकार क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने 19 जून 2026 के अपने फैसले में कहा था कि चलने का अधिकार संविधान के भाग III के तहत मौलिक अधिकार है। यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) में दिए गए आवागमन के अधिकार से जुड़ा है और अनुच्छेद 21 समेत अन्य मौलिक अधिकारों के साथ पढ़ा जाना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फुटपाथ पर सुरक्षित और निर्धारित तरीके से चलने का अधिकार पैदल यात्रियों के मौलिक अधिकार का हिस्सा है।
इस फैसले का सीधा मतलब यह है कि सड़क पर चलने वाले व्यक्ति की सुरक्षा को केवल ट्रैफिक व्यवस्था का विषय नहीं माना जा सकता। यह नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है।
मोटर वाहनों से पहले पैदल यात्रियों का अधिकार – फुटपाथ
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में एक महत्वपूर्ण बात यह कही गई कि पैदल चलने वालों का अधिकार मोटर वाहनों की आवाजाही से प्राथमिक है। यानी सड़क व्यवस्था बनाते समय सिर्फ कार, बस, ट्रक और दूसरे वाहनों की सुविधा को प्राथमिकता देना पर्याप्त नहीं होगा। पैदल यात्रियों के लिए भी सुरक्षित बुनियादी ढांचा जरूरी है।
इसका असर शहरों की सड़क योजना और फुटपाथ व्यवस्था पर पड़ सकता है। नगर निकायों और स्थानीय प्रशासन को सड़क निर्माण के साथ पैदल यात्रियों की जरूरतों पर भी ध्यान देना होगा।
सड़क है तो फुटपाथ की जिम्मेदारी भी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अगर कोई सड़क मौजूद है तो संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है कि पैदल चलने वालों के लिए निर्धारित और अच्छी तरह बनाए गए फुटपाथ उपलब्ध हों।
यह जिम्मेदारी केवल राज्य सरकारों तक सीमित नहीं है। कोर्ट ने शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगरपालिकाओं और पंचायतों को भी फुटपाथ के निर्माण, रखरखाव और सुरक्षा की जिम्मेदारी से जोड़ा है।
यानी अब फुटपाथ को केवल सड़क के किनारे बनी अतिरिक्त जगह के रूप में नहीं देखा जा सकता।
फुटपाथ पर अतिक्रमण बड़ी समस्या- फुटपाथ
देश के कई शहरों में फुटपाथ पर दुकानों, ठेलों, पार्किंग, निर्माण सामग्री और अन्य अतिक्रमण की वजह से लोगों को सड़क पर चलना पड़ता है।
ऐसे में पैदल यात्रियों और तेज गति से चलने वाले वाहनों के बीच दूरी कम हो जाती है। इससे दुर्घटना का खतरा बढ़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी सरकारों से कहा था कि फुटपाथ को अतिक्रमण मुक्त रखने और पैदल यात्रियों के लिए उचित सीमांकन करने की दिशा में कदम उठाए जाएं। 3 अगस्त को कोर्ट ने भी स्पष्ट रूप से कहा था कि फुटपाथ की उचित पहचान होनी चाहिए और पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित जगह को वाहनों से अलग रखा जाना चाहिए।
दिव्यांग लोगों के लिए भी जरूरी है सुरक्षित फुटपाथ

फुटपाथ का सवाल केवल सामान्य पैदल यात्रियों तक सीमित नहीं है। बुजुर्गों, बच्चों और दिव्यांग लोगों के लिए सुरक्षित और बाधा-मुक्त पैदल रास्ता बेहद जरूरी है।
पहले दिए गए निर्देशों में सुप्रीम कोर्ट ने disabled-friendly footpaths और pedestrian safety पर भी जोर दिया था।
इसका मतलब है कि भविष्य की सड़क व्यवस्था में सिर्फ फुटपाथ बनाना ही पर्याप्त नहीं होगा। उनकी डिजाइन और उपयोगिता भी ऐसी होनी चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा लोग सुरक्षित तरीके से उनका इस्तेमाल कर सकें।
फुटपाथ का मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा?
सुप्रीम कोर्ट का यह महत्वपूर्ण फैसला एक दुखद सड़क हादसे से जुड़े मामले से सामने आया। मामले में एक पांच वर्षीय बच्चे की उस समय मौत हो गई थी, जब वह अपने पिता के साथ स्कूल जा रहा था और एक टैंकर की चपेट में आ गया था।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सिर्फ मुआवजे के सवाल तक खुद को सीमित नहीं रखा। उसने व्यापक रूप से यह विचार किया कि पैदल चलने वालों को सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराना सरकार और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी क्यों होनी चाहिए।
इसके बाद कोर्ट ने फुटपाथ और पैदल यात्रियों के अधिकार को संवैधानिक अधिकार के रूप में स्पष्ट किया।
फुटपाथ नहीं होने पर सड़क पर चलना मजबूरी
भारत के कई हिस्सों में सड़क तो बन जाती है, लेकिन उसके साथ पर्याप्त फुटपाथ नहीं बनाया जाता। कई जगह फुटपाथ बना भी हो तो वह टूट चुका होता है या अतिक्रमण की वजह से इस्तेमाल करने लायक नहीं रहता।
ऐसी स्थिति में पैदल यात्री मजबूरी में सड़क के किनारे चलने लगते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की चिंता इसी स्थिति को लेकर है। अदालत के मुताबिक सड़क पर चलने वाले लोगों को वाहनों के बीच अपनी सुरक्षा के लिए संघर्ष नहीं करना चाहिए। पैदल चलना भी शहर की परिवहन व्यवस्था का जरूरी हिस्सा है।
सिर्फ फुटपाथ बनाना ही काफी नहीं – फुटपाथ
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का एक महत्वपूर्ण पहलू maintenance यानी रखरखाव भी है।
फुटपाथ बनाने के बाद उसे छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। समय के साथ टूट-फूट, अतिक्रमण, पार्किंग, कचरा और अन्य अवरोध पैदा हो सकते हैं।
इसलिए संबंधित निकायों को फुटपाथ की लगातार निगरानी और रखरखाव करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्थानीय अधिकारियों को फुटपाथ को demarcate, construct, maintain और safeguard करने की जिम्मेदारी से जोड़ा है।
अब राज्यों और UTs को क्या बताना होगा?
24 अगस्त की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मामले में शामिल किया है और उसके पहले के निर्देशों के अनुपालन को लेकर जवाब मांगा है।
इससे अब अलग-अलग राज्यों में फुटपाथ की स्थिति, उनके सीमांकन और अतिक्रमण हटाने जैसे मुद्दों पर प्रशासनिक कार्रवाई की निगरानी बढ़ सकती है।
आने वाले समय में राज्यों को यह बताना पड़ सकता है कि उनके यहां पैदल यात्रियों के लिए क्या व्यवस्था है और कोर्ट के निर्देशों को लागू करने के लिए कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं।
कानून बनाने की भी जरूरत जताई
सुप्रीम कोर्ट ने जून के फैसले में यह भी कहा था कि पैदल चलने के मौलिक अधिकार को प्रभावी बनाने के लिए एक उपयुक्त कानूनी ढांचे की जरूरत है। कोर्ट ने इस मुद्दे पर संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों और कानून आयोग को भी विचार के लिए फैसले की प्रति भेजने का निर्देश दिया था।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पैदल यात्रियों के अधिकार केवल न्यायिक टिप्पणियों तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें लागू करने के लिए स्पष्ट संस्थागत व्यवस्था भी हो।
आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
अगर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश प्रभावी तरीके से लागू होते हैं तो आम लोगों के लिए शहरों में पैदल चलना सुरक्षित हो सकता है।
खासकर:
- स्कूल जाने वाले बच्चों को सुरक्षित रास्ता मिल सकता है।
- बुजुर्गों के लिए सड़क पार करना और पैदल चलना आसान हो सकता है।
- दिव्यांग लोगों के लिए बेहतर pedestrian infrastructure विकसित हो सकता है।
- फुटपाथ पर अवैध कब्जे कम करने की कार्रवाई बढ़ सकती है।
- पैदल यात्रियों को सड़क पर वाहनों के बीच चलने की मजबूरी कम हो सकती है।
- नगर निकायों की जवाबदेही बढ़ सकती है।
शहरों की प्लानिंग में बड़ा बदलाव संभव
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख का असर भविष्य की urban planning पर भी पड़ सकता है।
अब सड़क बनाते समय केवल वाहनों की आवाजाही, चौड़ी सड़क और पार्किंग जैसी जरूरतों को देखना पर्याप्त नहीं होगा। पैदल यात्री, साइकिल सवार, बच्चे, बुजुर्ग और दिव्यांग लोगों की जरूरतों को भी योजना में शामिल करना जरूरी होगा।
इससे भारत के शहरों में pedestrian-friendly infrastructure विकसित करने की दिशा में बड़ा बदलाव आ सकता है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि पैदल चलना कोई मामूली सुविधा नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है। 19 जून 2026 के फैसले में अदालत ने निर्धारित और सुरक्षित फुटपाथ पर चलने के अधिकार को संविधान के मौलिक अधिकारों से जोड़ा था। अब 24 अगस्त को कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से उसके निर्देशों के अनुपालन पर जवाब मांगा है।
यह भी पढ़ें – प्रयागराज-लखनऊ हाईवे पर धंसी सड़क, बड़ा हादसा टला; एक साल पहले ही बना था फोरलेन, बारिश के बाद उठे सवाल



