नई दिल्ली: तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में कश्मीर का मुद्दा उठाया है। 22 सितंबर 2026 को UNGA में बोलते हुए एर्दोगन ने कहा कि कश्मीर समेत दक्षिण एशिया के सभी विवादों का समाधान बातचीत के जरिए होना चाहिए। उनका यह बयान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मौजूदगी में आया।
एर्दोगन 2019 के बाद कई बार UN के मंच से कश्मीर का जिक्र कर चुके हैं। हालांकि, 2024 में उन्होंने अपने UNGA भाषण में कश्मीर का नाम नहीं लिया था।
अब सवाल है कि तुर्किये बार-बार कश्मीर का मुद्दा क्यों उठाता है? इसके पीछे कई कूटनीतिक और रणनीतिक कारण बताए जाते हैं।
1. पाकिस्तान के साथ मजबूत रिश्ते
तुर्किये और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से करीबी संबंध हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा और रणनीतिक सहयोग भी बढ़ा है।
2026 में तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौता किया। इस समझौते से तीनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग को नया आधार मिला है। एर्दोगन का ताजा कश्मीर बयान इसी समझौते के कुछ हफ्तों बाद आया है।
2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान भी तुर्किये ने पाकिस्तान के साथ एकजुटता दिखाई थी। भारत के विदेश मंत्रालय ने उस दौरान तुर्किये से जुड़े ड्रोन की मौजूदगी का भी उल्लेख किया था।
2. मुस्लिम देशों में अपनी भूमिका मजबूत करना
एर्दोगन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फिलिस्तीन, गाजा और दूसरे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों पर भी मुखर रहे हैं। कश्मीर का मुद्दा भी उनकी विदेश नीति में इसी व्यापक रुख का हिस्सा माना जाता है।
कश्मीर का जिक्र करके तुर्किये पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने के साथ-साथ मुस्लिम देशों के बीच अपनी कूटनीतिक भूमिका को भी सामने रखता है।
हालांकि, यह कहना कि इसका एकमात्र उद्देश्य ‘मुस्लिम दुनिया का नेतृत्व’ करना है, एक विश्लेषणात्मक व्याख्या है, न कि तुर्किये की ओर से घोषित नीति।
3. घरेलू राजनीति और एर्दोगन की छवि
एर्दोगन की AKP पार्टी का आधार काफी हद तक धार्मिक और रूढ़िवादी मतदाताओं के बीच मजबूत रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम मुद्दों पर मुखर रुख अपनाने से एर्दोगन अपने समर्थकों के बीच एक ऐसे नेता की छवि बनाए रखते हैं जो दुनिया भर के मुस्लिम समुदायों से जुड़े मुद्दे उठाता है।
हालांकि, घरेलू राजनीति में कश्मीर के मुद्दे के सीधे प्रभाव को लेकर अलग-अलग विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है।
2024 में एर्दोगन ने कश्मीर का जिक्र क्यों नहीं किया था?
2024 में एर्दोगन ने कई वर्षों के बाद पहली बार UNGA के अपने भाषण में कश्मीर का उल्लेख नहीं किया था। उस समय तुर्किये BRICS में शामिल होने की कोशिश कर रहा था और भारत के साथ संबंध सुधारने की दिशा में भी बातचीत चल रही थी। कुछ विश्लेषणों में इसे भारत के साथ संबंधों को बेहतर करने की कोशिश से जोड़कर देखा गया था।
लेकिन 2025 और अब 2026 में एर्दोगन ने फिर से कश्मीर का मुद्दा उठाया है।
भारत का क्या कहना है?
भारत लगातार कहता रहा है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और भारत-पाकिस्तान से जुड़े मुद्दों को दोनों देशों के बीच बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए। भारत तीसरे पक्ष की मध्यस्थता का भी विरोध करता है और 1972 के शिमला समझौते का हवाला देता है।
भारत-तुर्किये रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा?
एर्दोगन के ताजा बयान से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक मतभेद फिर सामने आए हैं। दूसरी तरफ भारत और तुर्किये के बीच व्यापार और दूसरे क्षेत्रों में संबंध भी हैं।
इसलिए कश्मीर पर तुर्किये का रुख और भारत के साथ उसके आर्थिक संबंध—दोनों एक साथ चलते दिखाई देते हैं। एर्दोगन का ताजा बयान बताता है कि पाकिस्तान के साथ रणनीतिक रिश्ते और भारत के साथ आर्थिक संबंधों के बीच संतुलन बनाना तुर्किये के लिए एक अहम कूटनीतिक चुनौती है।



