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भारत के बड़े छात्र आंदोलन: जब छात्रों की आवाज ने बदल दी सरकारों की नीतियां

भारत के बड़े छात्र आंदोलन? भारत में छात्र सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं रहे हैं। कई बार उन्होंने ऐसे आंदोलन किए हैं, जिन्होंने सरकारों के फैसलों और देश की राजनीति पर बड़ा…

Priyanka Shaw 5 August 2026, 9:57 pm
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भारत के बड़े छात्र आंदोलन: जब छात्रों की आवाज ने बदल दी सरकारों की नीतियां
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भारत के बड़े छात्र आंदोलन?

भारत में छात्र सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं रहे हैं। कई बार उन्होंने ऐसे आंदोलन किए हैं, जिन्होंने सरकारों के फैसलों और देश की राजनीति पर बड़ा असर डाला। मेस फीस, भाषा विवाद, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी, पेपर लीक और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर छात्रों ने समय-समय पर बड़े आंदोलन किए हैं।

आज भी दिल्ली, झारखंड, पंजाब और देश के कई हिस्सों में छात्र अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। इतिहास बताता है कि जब छात्रों की आवाज को नजरअंदाज किया गया, तो सरकारों को अपने फैसले बदलने पड़े।

1960 का भाषा आंदोलन

1960 के दशक में केंद्र सरकार हिंदी को देश की एकमात्र आधिकारिक भाषा बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही थी। इसका सबसे ज्यादा विरोध तमिलनाडु में हुआ।

चेन्नई के कई कॉलेजों के छात्र सड़कों पर उतर आए। आंदोलन इतना बड़ा हो गया कि कई छात्रों ने आत्मदाह तक कर लिया। यह आंदोलन भाषा के साथ-साथ अपनी संस्कृति और पहचान को बचाने की लड़ाई बन गया।

लगातार विरोध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की सरकार ने भरोसा दिया कि गैर-हिंदी भाषी राज्यों की सहमति के बिना अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा के रूप में खत्म नहीं किया जाएगा।

1973 का गुजरात नवनिर्माण आंदोलन

दिसंबर 1973 में गुजरात के एल.डी. इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल की मेस फीस करीब 20 प्रतिशत बढ़ा दी गई। छात्रों ने इसका विरोध किया, लेकिन उनकी मांग नहीं मानी गई।

इसके बाद ‘नवनिर्माण आंदोलन’ शुरू हुआ। शुरुआत मेस फीस के विरोध से हुई, लेकिन बाद में यह महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सरकार के खिलाफ बड़ा जनआंदोलन बन गया।

छात्रों ने ‘नवनिर्माण युवक समिति’ बनाई और आंदोलन पूरे गुजरात में फैल गया। बढ़ते जनदबाव के कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा और राज्य विधानसभा भंग करनी पड़ी।

यह आजाद भारत का पहला बड़ा छात्र आंदोलन माना जाता है, जिसने लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई राज्य सरकार को सत्ता छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

1974 का जेपी आंदोलन, जिसने बदल दी देश की राजनीति

गुजरात आंदोलन की गूंज अभी शांत भी नहीं हुई थी कि मार्च 1974 में बिहार के छात्रों ने महंगाई, भ्रष्टाचार, शिक्षा व्यवस्था और बेरोजगारी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. पटना विश्वविद्यालय के छात्रों ने ‘बिहार छात्र संघर्ष समिति’ बनाई.

जब स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण इस आंदोलन से जुड़े तो इसे नई दिशा मिली. उन्होंने ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया, जिसका उद्देश्य केवल सरकार बदलना नहीं बल्कि पूरे राजनीतिक और सामाजिक ढांचे में बदलाव लाना था.

जेपी आंदोलन केवल एक छात्र आंदोलन नहीं रहा बल्कि राष्ट्रीय जनआंदोलन बन गया. इसी आंदोलन से कई ऐसे नेता निकले जिन्होंने आगे चलकर भारतीय राजनीति में दशकों तक अहम भूमिका निभाई.

जॉर्ज फर्नांडिस ने मजदूर और छात्र आंदोलनों को एक मंच पर लाकर इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ बड़ी चुनौती खड़ी की. लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव और सुशील कुमार मोदी जैसे नेता इसी आंदोलन की पृष्ठभूमि से उभरे.

इतिहासकारों का मानना है कि इसी आंदोलन के बढ़ते दबाव के बीच 1975 में देश में आपातकाल लागू हुआ और 1977 में पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी.

छह साल चला असम छात्र आंदोलन

पूर्वोत्तर भारत का सबसे बड़ा छात्र आंदोलन 1979 में शुरू हुआ. ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) ने मतदाता सूची में कथित अवैध प्रवासियों के नाम शामिल होने का विरोध किया.

यह आंदोलन छह वर्षों तक लगातार चलता रहा. इस दौरान असम में कई बार हिंसा, बंद और बड़े प्रदर्शन हुए. अंततः 1985 में केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच ऐतिहासिक असम समझौता हुआ.

इस आंदोलन के सबसे बड़े राजनीतिक परिणाम के रूप में छात्र नेता प्रफुल्ल कुमार महंत ने असम गण परिषद (AGP) बनाई और मात्र 33 वर्ष की उम्र में असम के मुख्यमंत्री बने. यह उदाहरण बताता है कि छात्र आंदोलन राजनीतिक नेतृत्व भी तैयार करते हैं.

मंडल आयोग और आरक्षण के खिलाफ विरोध

1990 में प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की.

इस फैसले के बाद देशभर में छात्रों का व्यापक विरोध शुरू हुआ. दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी द्वारा आत्मदाह के प्रयास की तस्वीर पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई. कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाई ठप हो गई, सड़कें प्रदर्शनकारियों से भर गईं और कई राज्यों में हिंसक घटनाएं भी हुईं.

हालांकि सरकार ने अपना फैसला वापस नहीं लिया, लेकिन इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति को स्थायी रूप से बदल दिया. इसके बाद जातीय समीकरण और सामाजिक न्याय की राजनीति देश के चुनावी विमर्श का प्रमुख हिस्सा बन गई.

21वीं सदी में शिक्षा, भर्ती और पेपर लीक नए आंदोलन का आधार

समय बदलने के साथ छात्र आंदोलनों के मुद्दे भी बदल गए. अब आंदोलन केवल फीस या भाषा तक सीमित नहीं हैं. भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, परीक्षा रद्द होना, रिजल्ट में देरी, पारदर्शिता की कमी, बेरोजगारी और सरकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया लंबी होने जैसे मुद्दे युवाओं की सबसे बड़ी चिंता बन चुके हैं.

हाल के वर्षों में NEET परीक्षा विवाद, विभिन्न राज्यों में शिक्षक भर्ती, रेलवे भर्ती, JPSC, JSSC, UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विरोध प्रदर्शनों ने दिखाया है कि युवाओं का असंतोष लगातार बढ़ रहा है. सोशल मीडिया ने इन आंदोलनों को नई ताकत दी है. अब किसी भी मुद्दे पर कुछ घंटों में लाखों लोग ऑनलाइन जुड़ जाते हैं और आंदोलन राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाता है.

क्या सोशल मीडिया ने बदल दी आंदोलन की तस्वीर

पहले छात्र आंदोलन कॉलेज परिसरों तक सीमित रहते थे और उन्हें पूरे देश में फैलने में कई सप्ताह या महीने लग जाते थे. लेकिन आज एक्स (पूर्व ट्विटर), इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और व्हाट्सएप जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म आंदोलन को कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा देते हैं.

एक हैशटैग, एक वीडियो या एक पोस्ट लाखों लोगों तक पहुंचकर सरकारों पर तुरंत प्रतिक्रिया देने का दबाव बना सकता है. यही वजह है कि आज छात्र आंदोलनों का प्रभाव पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज और व्यापक दिखाई देता है.

छात्र आंदोलन क्यों बन जाते हैं बड़े जनआंदोलन?

भारत का इतिहास बताता है कि छात्र आंदोलन सिर्फ कॉलेज या यूनिवर्सिटी तक सीमित नहीं रहते। कई बार ये समाज में बढ़ते असंतोष का संकेत बन जाते हैं और सरकारों को बड़े फैसले लेने पर मजबूर कर देते हैं।

अगर सरकार समय पर छात्रों से बातचीत करे, उनकी समस्याएं सुने और पारदर्शी तरीके से समाधान निकाले, तो हालात सामान्य बने रहते हैं। लेकिन जब छात्रों की मांगों को लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाता है, तो आंदोलन बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकते हैं।

आज देश के करोड़ों युवाओं की सबसे बड़ी चिंताएं रोजगार, अच्छी शिक्षा, निष्पक्ष भर्ती प्रक्रिया और पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था हैं। अगर इन मुद्दों पर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो युवाओं में नाराजगी और बढ़ सकती है।

यह भी पढ़ें- Sawan Somwar 2026: जानें चारों सावन सोमवार की तारीख और इस बार बनने वाले शुभ योग

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Priyanka Shaw

NAV24 News की संपादकीय टीम से प्रकाशित रिपोर्ट।

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