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सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के एक संपत्ति विवाद में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ ‘घर-दामाद’ बनाकर किसी व्यक्ति को संपत्ति का कानूनी उत्तराधिकारी नहीं बनाया जा सकता, जब तक कि उस समुदाय में ऐसी परंपरा साबित न हो।

बता दे कि सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के उरांव आदिवासी समुदाय से जुड़े संपत्ति विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कोई व्यक्ति अपनी भतीजी के पति को ‘घर-दामाद’ के रूप में गोद लेकर संपत्ति का उत्तराधिकारी नहीं बना सकता, जब तक कि ऐसी परंपरा साबित न हो जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में तीन अदालतों के एक जैसे फैसलों को पलट दिया।

जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि किसी परंपरा को साबित करने की जिम्मेदारी हमेशा उस पक्ष की होती है, जो उसका दावा करता है। पीठ ने उस दावे को खारिज कर दिया कि लेदुरा उरांव अपनी संपत्ति का उत्तराधिकार देने के लिए अपनी भतीजी के पति पुनाई उरांव को ‘घर-दामाद’ के तौर पर गोद ले सकते थे।

यह विवाद एक उरांव परिवार की पैतृक संपत्ति को लेकर उत्पन्न हुआ, जहां प्रतिवादियों ने पुनाई उरांव के जरिये उत्तराधिकार का दावा इस आधार पर किया कि उन्हें बिना संतान वाले लेदुरा उरांव ने घर-दामाद के रूप में स्वीकार किया था। हालांकि, याचिकाकर्ता बेजला उरांव ने इस दावे को चुनौती देते हुए कहा कि ऐसी कोई सामान्य परंपरा नहीं है।

अदालत ने माना कि प्रतिवादी ऐसी परंपरा का अस्तित्व साबित करने में नाकाम रहे और वादी के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट, पहली अपीलीय अदालत और झारखंड हाई कोर्ट के निर्णयों को खारिज कर दिया।

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