दवाओं की MRP (Maximum Retail Price) और PTR (Price to Retailer) के बीच बड़े अंतर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है। कोर्ट ने सुझाव दिया है कि दवाओं की MRP और रिटेलर को मिलने वाली कीमत के बीच अंतर 16 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होना चाहिए। इस मामले में अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।
कोर्ट: DPCO 2013 के नियमों पर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में Drugs Price Control Order (DPCO), 2013 की कमियों का मुद्दा उठाया गया है। याचिकाकर्ता किशन चंद जैन और संजय कुलश्रेष्ठ का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में केवल जरूरी यानी शेड्यूल्ड दवाओं की कीमतों पर ही नियंत्रण है।
उनका कहना है कि गैर-शेड्यूल्ड दवाओं की शुरुआती कीमतों पर सरकार का प्रभावी नियंत्रण नहीं है। याचिकाओं के मुताबिक, बाजार में मौजूद कुल दवाओं में केवल करीब 17 प्रतिशत दवाएं शेड्यूल्ड कैटेगरी में आती हैं।
मरीजों से ज्यादा कीमत वसूलने पर कोर्ट की नाराजगी
पिछले सप्ताह सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने दवाओं की कीमतों में बड़े अंतर पर सख्त टिप्पणी की थी।
कोर्ट को बताया गया कि कैंसर की एक दवा रिटेलर को करीब 2,700 रुपये में मिलती है, जबकि उसकी MRP करीब 27,000 रुपये है। कोर्ट ने इतने बड़े अंतर को मरीजों पर भारी बोझ बताते हुए बेहद कड़ी टिप्पणी की थी।
कोर्ट: सरकार ने माना, दवाओं की कीमतों में है बड़ा अंतर
29 सितंबर की सुनवाई में केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं की चिंता को पूरी तरह गलत नहीं कहा जा सकता और दवाओं की कीमतों में बड़ा अंतर मौजूद है।
हालांकि, उन्होंने कहा कि इस अंतर का पूरा फायदा सीधे फार्मा कंपनियों को मिलता है, ऐसा जरूरी नहीं है। सरकार ने कहा कि ऐसा समाधान तलाशने की जरूरत है, जिसमें सभी पक्षों के हितों के बीच संतुलन बना रहे।
कोर्ट ने पूछा- बाकी दवाओं पर भी 16% की सीमा क्यों नहीं?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जरूरी दवाओं की कीमत तय करने की मौजूदा व्यवस्था में रिटेलर मार्जिन 16 प्रतिशत रखा गया है। ऐसे में कोर्ट ने सवाल उठाया कि बाकी दवाओं की MRP और PTR के बीच भी एक समान सीमा क्यों नहीं तय की जा सकती।
कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि जरूरी दवाओं और मेडिकल डिवाइस को कीमत नियंत्रण के दायरे से बाहर रखने का आधार क्या है। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।
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