मुंबई: महाराष्ट्र में फूड सेफ्टी को लेकर FDA कमिश्नर तुकाराम मुंडे की कार्रवाई इन दिनों चर्चा में है। इसी बीच अभिनेत्री और लेखिका ट्विंकल खन्ना ने अपने ‘मिसेज फनीबोन्स’ कॉलम में इस अभियान को लेकर मजेदार अंदाज में अपनी बात रखी।
ट्विंकल खन्ना ने फूड बिजनेस पर हो रही कार्रवाई को अपनी रसोई से जोड़ते हुए लिखा कि तुकाराम मुंडे के अभियान से प्रभावित होकर उन्होंने भी घर की रसोई में ‘छापेमारी’ करने का फैसला किया।
किचन में मिला पुराना ‘शाही मसाला’
ट्विंकल ने बताया कि रसोई की जांच के दौरान उन्हें ‘शाही मसाला’ का एक पुराना पैकेट मिला। इसकी एक्सपायरी डेट देखकर उन्होंने मजाकिया अंदाज में लिखा कि ऐसा लग रहा था जैसे यह पैकेट ‘मुगल साम्राज्य के समय’ का हो।
इसी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने मुगल इतिहास और भारतीय खानपान से जुड़े विवादों पर भी तंज किया। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर इतिहास की किताबों से मुगलों के प्रभाव को हटाने की कोशिश की जा रही है, तो फिर उनके दौर से जुड़े माने जाने वाले खानपान पर भी सवाल उठना चाहिए।
उन्होंने उदाहरण के तौर पर कोफ्ता, कोरमा और कबाब जैसे लोकप्रिय व्यंजनों का जिक्र किया।
कैसे विकसित हुआ मुगलई खाना?
मुगलई खानपान को भारतीय उपमहाद्वीप में विकसित हुई एक खास पाक शैली माना जाता है। मुगल अपने साथ फारसी, तुर्की और अफगान खानपान की परंपराएं लेकर आए थे।
इन परंपराओं का मेल जब भारत के मसालों और स्थानीय सामग्री से हुआ, तो धीरे-धीरे एक अलग तरह की पाक शैली विकसित हुई, जिसे आज मुगलई खाना कहा जाता है।
मुगल बादशाह बाबर के भारत आने के बाद मध्य एशियाई और फारसी खाना पकाने की तकनीकों का स्थानीय सामग्री के साथ मेल बढ़ा। इसी प्रक्रिया को मुगलई खानपान के विकास की शुरुआती कड़ी माना जाता है।
शाही खानपान में आया बदलाव
शाहजहां और औरंगजेब के दौर में मुगलई खानपान काफी विकसित हुआ। शाही रसोई में बड़ी संख्या में रसोइए काम करते थे और अलग-अलग व्यंजन बनाने में विशेषज्ञ लोग होते थे।
धीमी आंच पर खाना पकाने की तकनीक को खास महत्व दिया गया। दम पुख्त में बर्तन को अच्छी तरह बंद करके धीमी आंच पर खाना पकाया जाता है, जिससे मसालों और सामग्री का स्वाद धीरे-धीरे विकसित होता है।
बिरयानी, कोरमा और कबाब जैसे व्यंजनों को भी इस दौर में शाही रसोई में खास पहचान मिली। तंदूर में खाना पकाने की परंपरा से नान, तंदूरी रोटी और दूसरे व्यंजनों को लोकप्रियता मिली।
कबाब को लेकर क्या है इतिहास?
कबाब को आज मुगलई खाने की पहचान से जोड़ा जाता है। शाही रसोई में मांस को मसालों के साथ तैयार कर आग पर भूनने और पकाने की परंपरा रही।
समय के साथ भारत में कबाब की कई अलग-अलग किस्में विकसित हुईं। सीख कबाब और लखनऊ के नरम कबाब इसके लोकप्रिय उदाहरण हैं।
हालांकि, यह भी कहा जाता है कि आग पर मांस पकाने की परंपरा मुगल काल से काफी पुरानी है। कुछ दावों के मुताबिक, दिल्ली सल्तनत के दौर में भी भारत में कबाब जैसी चीजें मौजूद थीं। ऐसे में यह माना जा सकता है कि मुगलों ने पहले से मौजूद कुछ खानपान की परंपराओं को अपने तरीके और तकनीकों के साथ आगे विकसित किया।
कोरमा कैसे बना लोकप्रिय?
कोरमा एक गाढ़ी और स्वादिष्ट ग्रेवी वाला व्यंजन है। इसे आमतौर पर दही, क्रीम, मेवे और मसालों के साथ तैयार किया जाता है और धीमी आंच पर पकाया जाता है।
कोरमा की खासियत इसका गहरा और धीरे-धीरे खुलने वाला स्वाद है। हालांकि, कोरमा की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग मत मिलते हैं।
कुछ जगहों पर इसे मुगलई खानपान से जोड़ा जाता है, जबकि यह भी कहा जाता है कि आज जिस तरह का क्रीमी और मेवेदार कोरमा खाया जाता है, वह बाद की भारतीय शाही रसोइयों में विकसित हुआ।
फारसी शोरबे और भारतीय मसालों, मेवों तथा केसर के मेल से समय के साथ ऐसी गाढ़ी ग्रेवी विकसित हुई, जिसे आज कोरमा के नाम से जाना जाता है।
ट्विंकल खन्ना का अंदाज फिर चर्चा में
ट्विंकल खन्ना ने अपने पुराने ‘शाही मसाले’ के बहाने फूड सेफ्टी की कार्रवाई और मुगलई खानपान के इतिहास को एक साथ जोड़ दिया। उनका यह अंदाज सोशल मीडिया और पाठकों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
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