दिवाली का त्योहार हो और आसमान में रंग-बिरंगी आतिशबाजी न दिखाई दे, ऐसा कम ही देखने को मिलता है. भारत में दिवाली से लेकर शादी और क्रिकेट में जीत तक, कई मौकों पर पटाखे जलाए जाते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पटाखे सबसे पहले किस देश में बनाए गए थे? क्या इनकी शुरुआत भारत में हुई थी या फिर किसी दूसरे देश से पटाखे भारत पहुंचे थे?
दरअसल, पटाखों का इतिहास हजारों साल पुराना है. माना जाता है कि दुनिया में सबसे पहले पटाखों का इस्तेमाल चीन में हुआ था. उस समय पटाखे आज की तरह नहीं होते थे, बल्कि लोग बांस के टुकड़ों से तेज आवाज पैदा करते थे.
सबसे पहले चीन में हुई थी पटाखों की शुरुआत
कई रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 200 ईसा पूर्व प्राचीन चीन में लोग बांस के खोखले टुकड़ों को आग में डालते थे. आग की गर्मी से बांस के अंदर की हवा फैलती थी और कुछ देर बाद बांस तेज आवाज के साथ फट जाता था.
उस समय लोगों का मानना था कि इस तेज आवाज से बुरी आत्माएं और नकारात्मक शक्तियां दूर भाग जाती हैं. हालांकि, उस दौर में इन बांस के टुकड़ों में बारूद का इस्तेमाल नहीं होता था.
बारूद की खोज से बदल गई पटाखों की दुनिया
पटाखों के इतिहास में बड़ा बदलाव तब आया, जब चीन में बारूद की खोज हुई. करीब 9वीं शताब्दी में कुछ चीनी केमिस्ट और ताओवादी साधु अमर होने की दवा बनाने के लिए अलग-अलग चीजों पर प्रयोग कर रहे थे.
इसी दौरान गंधक, कोयला और पोटैशियम नाइट्रेट को मिलाने से एक ऐसा मिश्रण तैयार हुआ, जो आग के संपर्क में आते ही तेजी से जलने और धमाका करने लगा. इसे ब्लैक पाउडर या बारूद कहा गया.
बाद में लोगों ने इस बारूद को बांस और कागज की नलियों में भरना शुरू किया. इससे तेज आवाज और रोशनी पैदा होने लगी. धीरे-धीरे चीन में त्योहारों, शादियों और शाही समारोहों में पटाखों का इस्तेमाल होने लगा.
चीन से यूरोप तक कैसे पहुंचे पटाखे?
चीन में बारूद और आतिशबाजी की तकनीक धीरे-धीरे दूसरे देशों तक पहुंचने लगी. करीब 13वीं शताब्दी तक यह तकनीक मध्य एशिया और अरब देशों में भी पहुंच गई थी. इसके बाद यूरोप में भी बारूद का इस्तेमाल शुरू हो गया.
शुरुआत में बारूद का इस्तेमाल युद्ध और हथियार बनाने के लिए किया जाता था. लेकिन समय के साथ लोगों ने इसका इस्तेमाल मनोरंजन और उत्सवों में भी करना शुरू कर दिया.
यूरोप के शाही समारोहों और बड़े आयोजनों में आतिशबाजी का चलन तेजी से बढ़ा. इसके बाद अलग-अलग रंगों और डिजाइन वाले पटाखे बनाए जाने लगे.
भारत में कब पहुंचे पटाखे?
भारत में पटाखों की शुरुआत कब हुई, इसकी कोई पक्की जानकारी नहीं है. हालांकि, इतिहास से पता चलता है कि 15वीं शताब्दी तक भारत में शाही समारोहों के दौरान आतिशबाजी का इस्तेमाल होने लगा था.
साल 1443 में विजयनगर साम्राज्य के राजा देवराय द्वितीय के दरबार में फारसी राजदूत अब्दुर रज्जाक पहुंचे थे. उन्होंने महानवमी उत्सव का वर्णन करते हुए आग और आतिशबाजी से जुड़े कई मनोरंजक कार्यक्रमों का जिक्र किया था. इससे पता चलता है कि उस समय भारत में भी आतिशबाजी का चलन था.
मुगल काल में भी खूब होती थी आतिशबाजी
मुगल शासन के दौरान भारत में पटाखों और आतिशबाजी का इस्तेमाल और बढ़ गया. मुगल शासकों के शाही विवाह, त्योहारों और खास समारोहों में बड़े स्तर पर आतिशबाजी की जाती थी.
धीरे-धीरे यह परंपरा शाही महलों से निकलकर आम लोगों तक पहुंच गई. इसके बाद पटाखे कई त्योहारों और खुशी के मौकों का हिस्सा बन गए.
क्या शुरुआत से ही दिवाली पर जलाए जाते थे पटाखे?
आज दिवाली और पटाखों को एक-दूसरे से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन इतिहास में ऐसा कोई पक्का प्रमाण नहीं मिलता कि शुरुआत से ही दिवाली पर पटाखे जलाने की परंपरा थी.
दरअसल, दिवाली पर दीये जलाने की परंपरा काफी पुरानी है. समय के साथ आतिशबाजी भी इस त्योहार का हिस्सा बन गई. आज लोग दीपों के साथ रंग-बिरंगे पटाखों से भी दिवाली का जश्न मनाते हैं. हालांकि, बढ़ते वायु और ध्वनि प्रदूषण को देखते हुए सुरक्षित और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार तरीके से त्योहार मनाना भी जरूरी है.



