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माघ मेला 2026 विवाद: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन – पूरा सच, विवाद की तह और PC .

PC – उत्तर भारत के सबसे विख्यात धार्मिक आयोजन प्रयागराज का माघ मेला 2026 इस बार धार्मिक-प्रशासनिक विवाद के कारण सुर्खियों में है। मुख्य रूप से विवाद का केंद्र रहे हैं ज्योतिषपीठ…

Niharika Gupta 30 January 2026, 12:31 pm
1 मिनट पढ़ें
माघ मेला 2026 विवाद: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन – पूरा सच, विवाद की तह और PC .
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PC – उत्तर भारत के सबसे विख्यात धार्मिक आयोजन प्रयागराज का माघ मेला 2026 इस बार धार्मिक-प्रशासनिक विवाद के कारण सुर्खियों में है। मुख्य रूप से विवाद का केंद्र रहे हैं ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, जिनके माघ मेला में स्नान और प्रशासन के बीच गतिरोध ने न सिर्फ धार्मिक दृष्टिकोण से बल्कि सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर भी तीखी बहस को जन्म दिया है

इस रिपोर्ट में हम पूरा मामला, विवाद की जड़ें, दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप, प्रशासन की प्रतिक्रिया, राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ और 30 जनवरी 2026 को होने वाली PC की पृष्ठभूमि के बारे में विस्तार से समझेंगे।

1. विवाद की शुरुआत — मौनी अमावस्या के दिन टकराव

25 जनवरी 2026 को प्रयागराज में माघ मेला चल रहा था, जिसमें हर वर्ष की तरह हजारों श्रद्धालु संगम तट पर मौनी अमावस्या का पवित्र स्नान करने आए थे। इसी बीच शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपनी पलकी/रथ लेकर संगम की ओर बढ़ने की कोशिश की, लेकिन मेला प्रशासन और पुलिस ने सुरक्षा कारणों से रथ को आगे बढ़ने से रोका।

समर्थकों और प्रशासन के बीच हुए संघर्ष के कारण माहौल तनावपूर्ण बन गया और शंकराचार्य ने स्नान से इनकार कर दिया, साथ ही अपने शिष्यों के साथ मारपीट के आरोप लगाए।

उन्होंने कहा कि रथ-पालकी परंपरा धर्म का हिस्सा है और बिना सम्मान के आगे बढ़ने पर वे स्नान नहीं करेंगे। इसी कारण उन्होंने मेले को बीच में छोड़कर बिना संगम स्नान किए वाराणसी लौटने का फैसला लिया।

यह बात माघ मेला के इतिहास में काफी असामान्य मानी गई, क्योंकि आम तौर पर शंकराचार्य सभी धार्मिक अनुष्ठानों में सम्मान के साथ भाग लेते हैं।

2. विवाद का विस्तृत कारण और प्रशासन की कार्रवाई – PC

प्रशासन के अनुसार, उन्होंने भीड़-व्यवस्था और सुरक्षा की दृष्टि से यह कदम उठाया। भीड़ नियंत्रण की दृष्टि से रथ को आगे भेजने की अनुमति नहीं दी गई थी और सुरक्षा कारणों से कई प्रतिबंध लगाए गए थे।

हाल ही में जारी पहले और दूसरे नोटिस में प्रशासन ने शंकराचार्य को चेतावनी भी दी थी कि यदि विवाद जारी रहा तो उन्हें मेला में प्रवेश पर रोक लगाया जा सकता है।

प्रशासन के अनुसार, संत मंच और अधिकारियों के बीच संवाद में समस्या उत्पन्न हुई जिसने विवाद को बढ़ा दिया।

3. शंकराचार्य की शर्तें और प्रशासन की प्रतिक्रिया

विवाद के टूटते मोड़ पर प्रशासन ने शंकराचार्य से माफी मांगने के संकेत दिए हैं। स्थानीय अधिकारियों और वरिष्ठ अफसरों ने उनके पास जाकर यह आश्वासन दिया कि यदि विवाद शांत किया जाए तो उन्हें पूर्णिमा के दिन संगम में ससम्मान स्नान कराया जाएगा।

लेकिन शंकराचार्य ने इसके लिए दो प्रमुख शर्तें रखीं:

  1. जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा लिखित रूप में माफी मांगी जाए।
  2. चारों शंकराचार्यों के लिए माघ मेला, कुंभ और महाकुंभ में पदोन्नति और प्रोटोकॉल तय करके घोषित किया जाए।

वाराणसी लौटने के बाद प्रशासन और संत समाज के बीच बातचीत जारी है, और इसी के परिणामस्वरूप 30 जनवरी को शंकराचार्य की प्रेस कॉन्फ़्रेंस तय की गई है जिसमें विवाद का भविष्य साफ होगा।

4. 30 जनवरी की PC – क्या होगा खुलासा?

शंकराचार्य की तरफ़ से आज सुबह 11 बजे प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाई गई है, जिसमें यह स्पष्ट किया जाएगा कि वे अपनी शर्तों पर प्रशासन का प्रस्ताव स्वीकार करते हैं या नहीं।

इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस का सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि:

  1. क्या वे प्रयागराज लौटकर संगम स्नान करेंगे?
  2. क्या प्रशासन लिखित माफी देगा?
  3. क्या शर्तें पूरी होने पर पूर्णिमा पर पारंपरिक भूमिका निभाई जाएगी?

यह प्रेस कॉन्फ़ेंस इसी विवाद का संभवत: टर्निंग पॉइंट साबित हो सकती है, क्योंकि इसके बाद विवाद शांति की ओर बढ़ सकता है या फिर और तीव्र रूप से रुख ले सकता है।

5. राजनीतिक और सामाजिक असर – PC

इस विवाद का राजनीतिक और सामाजिक असर भी देखा जा रहा है।

  1. उत्तर प्रदेश में एक GST डिप्टी कमिश्नर ने CM योगी आदित्यनाथ के समर्थन में इस्तीफा दे दिया, यह कहते हुए कि शंकराचार्य ने मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पर अपमानजनक टिप्पणी की थी।
  2. वहीं विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे को सनातन परंपरा पर हमला बताकर भाजपा-सरकार की आलोचना की है।
  3. संत समाज भी बंट गया दिख रहा है — कुछ संतों ने प्रशासन को निशाना बनाया, कुछ संतों ने शंकराचार्य के समर्थन में बयान दिए।

इसके अलावा सोशल मीडिया और धार्मिक समुदायों में दोनों पक्षों के समर्थन-विरोध के लिए बहस जारी है, जिससे विवाद व्यापक स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

6. क्या था विवाद का मूल कारण?

शंकराचार्य का दावा है कि उनके अनुयायियों के साथ व्यवहार में असम्मान दिखाया गया और परंपरागत रथ/पालकी के उपयोग को रोक दिया गया, जो उनके लिए अस्वीकार्य था। उनका कहना है कि धार्मिक सम्मान और परंपरा बिना सम्मान के आगे नहीं बढ़ सकती।

वहीं प्रशासन का कथन रहा कि भीड़-व्यवस्था और सुरक्षा की दृष्टि से कदम उठाए गए और किसी प्रकार का विशेष लक्ष्य नहीं था। दोनों पक्षों के बीच संवाद की कमी ने विवाद को बढ़ावा दिया।

यह भी पढ़ें – भारत-EU मुक्त व्यापार समझौता 2026 – FTA “मदर ऑफ ऑल डील्स”

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Niharika Gupta

NAV24 News की संपादकीय टीम से प्रकाशित रिपोर्ट।

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