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लता Bhagwan Kare: 65 साल की उम्र में नंगे पैर दौड़कर बचाई पति की जान, हौसले की मिसाल बनीं ‘रनिंग वाली दादी’

Lata Bhagwan Kare Story: उम्र के एक पड़ाव पर जहां ज्यादातर लोग आराम और सुकून की जिंदगी की उम्मीद करते हैं, वहीं महाराष्ट्र की 65 वर्षीय लता भगवान करे ने ऐसा कारनामा…

Niharika Gupta 10 August 2026, 2:55 pm
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लता Bhagwan Kare: 65 साल की उम्र में नंगे पैर दौड़कर बचाई पति की जान, हौसले की मिसाल बनीं ‘रनिंग वाली दादी’
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Lata Bhagwan Kare Story: उम्र के एक पड़ाव पर जहां ज्यादातर लोग आराम और सुकून की जिंदगी की उम्मीद करते हैं, वहीं महाराष्ट्र की 65 वर्षीय लता भगवान करे ने ऐसा कारनामा कर दिखाया, जिसने पूरे देश को प्रेरित कर दिया। पति की गंभीर बीमारी और इलाज के लिए पैसों की कमी के बीच लता ने हार मानने के बजाय दौड़ने का फैसला किया। खास बात यह थी कि उन्होंने न तो कभी मैराथन की ट्रेनिंग ली थी और न ही उनके पास दौड़ने के लिए महंगे जूते थे।

उन्होंने साड़ी पहनकर और नंगे पैर मैराथन में हिस्सा लिया और अपने से काफी कम उम्र के प्रतिभागियों को पीछे छोड़ते हुए जीत हासिल की। इस जीत से मिले पुरस्कार की राशि का इस्तेमाल उन्होंने अपने बीमार पति के इलाज और जरूरी मेडिकल जांच के लिए किया।

लता भगवान करे की यह कहानी सिर्फ एक महिला के मैराथन जीतने की कहानी नहीं है। यह प्यार, हिम्मत, संघर्ष और परिवार के लिए किसी भी हद तक जाने के जज्बे की कहानी है।

पति की बीमारी ने खड़ी कर दी थी बड़ी मुश्किल

लता भगवान करे का जीवन सामान्य ग्रामीण परिवारों की तरह संघर्षों से भरा रहा। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। इसी बीच उनके पति की तबीयत अचानक गंभीर रूप से खराब हो गई।

डॉक्टरों ने बीमारी की सही स्थिति जानने के लिए कई महंगी मेडिकल जांच कराने की सलाह दी। इनमें MRI जैसी महंगी जांच भी शामिल थी। लेकिन परिवार के सामने सबसे बड़ी समस्या पैसों की थी।

पति की बीमारी बढ़ रही थी और इलाज के लिए जरूरी रकम उनके पास नहीं थी। ऐसे मुश्किल समय में लता के सामने दो रास्ते थे—या तो परिस्थितियों के आगे हार मान लें या फिर कोई ऐसा रास्ता खोजें, जिससे पति का इलाज कराया जा सके।

लता ने दूसरा रास्ता चुना।

जब लता को मिला मैराथन का आइडिया

इसी दौरान लता को बारामती मैराथन के बारे में जानकारी मिली। उन्हें पता चला कि प्रतियोगिता में विजेताओं को नकद पुरस्कार दिया जाता है।

यह जानकारी उनके लिए उम्मीद की एक किरण बन गई।

लता ने फैसला किया कि वह मैराथन में हिस्सा लेंगी और जीतने की पूरी कोशिश करेंगी। यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि लता ने पहले कभी मैराथन की प्रोफेशनल ट्रेनिंग नहीं ली थी।

उनके पास न रनिंग का अनुभव था और न ही खेलों की कोई पृष्ठभूमि।

लेकिन उनके पास एक ऐसी ताकत थी, जो किसी भी ट्रेनिंग से बड़ी थी—अपने पति को बचाने की इच्छा।

साड़ी पहनकर नंगे पैर दौड़ीं लता भगवान करे

मैराथन के दिन लता ने किसी एथलीट की तरह स्पोर्ट्स ड्रेस या रनिंग शूज नहीं पहने थे। उन्होंने अपनी पारंपरिक साड़ी पहनकर नंगे पैर दौड़ना शुरू किया।

उनके सामने मैदान में कई युवा और प्रशिक्षित धावक मौजूद थे। उनके पास बेहतर फिटनेस, अनुभव और रनिंग की तैयारी थी।

लेकिन लता के मन में सिर्फ एक लक्ष्य था—दौड़ पूरी करनी है और पति के इलाज के लिए पैसे जुटाने हैं।

उन्होंने बिना किसी डर के दौड़ना शुरू किया। नंगे पैर दौड़ते हुए उनके पैरों में दर्द भी हुआ होगा, थकान भी आई होगी, लेकिन उन्होंने अपनी गति बनाए रखी।

उनकी आंखों के सामने सिर्फ अपने पति की जिंदगी थी।

युवा धावकों को पीछे छोड़कर जीतीं मैराथन

लता की मेहनत और जज्बे का परिणाम बेहद शानदार रहा। उन्होंने मैराथन में पहला स्थान हासिल किया।

जिस महिला ने कभी प्रोफेशनल रनिंग की ट्रेनिंग नहीं ली थी, जिसने साड़ी पहनकर और नंगे पैर दौड़ लगाई थी, उसने कई युवा धावकों को पीछे छोड़ दिया।

उनकी जीत की खबर सामने आते ही लोग हैरान रह गए।

लेकिन लता के लिए यह सिर्फ एक प्रतियोगिता की जीत नहीं थी।

उनके लिए यह उनके पति की जिंदगी बचाने की लड़ाई में मिली एक बड़ी जीत थी।

पुरस्कार की रकम से कराया पति का इलाज

मैराथन जीतने के बाद लता को नकद पुरस्कार मिला। आमतौर पर किसी प्रतियोगिता में जीतने के बाद लोग पुरस्कार की रकम का इस्तेमाल अपनी जरूरतों या भविष्य के लिए करते हैं।

लेकिन लता ने ऐसा नहीं किया।

उन्होंने पुरस्कार की राशि सीधे अपने पति की मेडिकल जांच और इलाज में लगा दी। MRI जैसी जरूरी जांच कराने में भी इस रकम ने उनकी मदद की।

पति के इलाज के लिए दौड़ने वाली लता की कहानी ने लोगों को यह दिखाया कि जब किसी इंसान के सामने अपने परिवार की जिंदगी बचाने का लक्ष्य हो, तो उसके भीतर कितनी ताकत पैदा हो सकती है।

लता भगवान करे की कहानी क्यों है खास?

लता भगवान करे की कहानी कई मायनों में खास है। सबसे पहली बात यह कि उन्होंने उम्र को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।

65 साल की उम्र में जहां दौड़ना भी कई लोगों के लिए मुश्किल हो सकता है, वहां लता ने मैराथन जैसी कठिन प्रतियोगिता में हिस्सा लिया।

दूसरी खास बात उनकी आर्थिक स्थिति थी। उनके पास महंगे रनिंग शूज खरीदने या प्रोफेशनल ट्रेनिंग लेने के पैसे नहीं थे।

तीसरी और सबसे बड़ी बात थी उनका उद्देश्य।

लता ने मैराथन किसी मेडल, शोहरत या लोकप्रियता के लिए नहीं दौड़ी थी। उन्होंने अपने पति के इलाज के लिए पैसे जुटाने के लिए दौड़ लगाई थी।

यही वजह है कि उनकी कहानी लोगों के दिल को छू गई।

पति के प्रति समर्पण ने बना दिया प्रेरणास्रोत

लता भगवान करे की कहानी में पति-पत्नी के रिश्ते की गहराई भी दिखाई देती है।

मुश्किल समय में अक्सर आर्थिक परेशानियां परिवारों को तोड़ देती हैं। लेकिन लता ने आर्थिक संकट के सामने घुटने टेकने के बजाय अपने पति के लिए संघर्ष करने का फैसला किया।

उनकी दौड़ के पीछे एक पत्नी का प्यार था।

उनके कदमों में अपने परिवार को बचाने की कोशिश थी।

और उनकी जीत के पीछे सिर्फ पुरस्कार की राशि नहीं, बल्कि एक जिंदगी बचाने की उम्मीद थी।

यही वजह है कि लता की कहानी सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रही। उनकी बहादुरी और संघर्ष ने देशभर के लोगों का ध्यान खींचा।

देशभर में मिली पहचान

मैराथन जीतने के बाद लता भगवान करे की कहानी तेजी से लोगों तक पहुंची। उनकी तस्वीर और कहानी सोशल मीडिया तथा मीडिया रिपोर्ट्स के जरिए चर्चा में आई।

लोगों ने उनकी तुलना उन खिलाड़ियों से नहीं की, जिन्होंने सालों तक ट्रेनिंग लेकर प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया था। बल्कि उनकी कहानी को एक ऐसी महिला के साहस के रूप में देखा गया, जिसने जीवन की सबसे कठिन परिस्थिति में अपने अंदर की ताकत को पहचाना।

लता के लिए दौड़ सिर्फ खेल नहीं थी।

वह उनके परिवार के लिए संघर्ष का माध्यम थी।

उनकी कहानी ने यह संदेश भी दिया कि परिस्थितियां कितनी भी मुश्किल क्यों न हों, इंसान अगर ठान ले तो उम्मीद का रास्ता खोज सकता है।

लता भगवान करे की जिंदगी पर बनी फिल्म

लता भगवान करे की असाधारण कहानी ने फिल्म निर्माताओं को भी प्रभावित किया। उनकी जिंदगी और संघर्ष से प्रेरित होकर एक फीचर फिल्म बनाई गई, जिसके जरिए उनकी कहानी बड़े पर्दे तक पहुंची।

फिल्म ने लोगों को यह समझने का मौका दिया कि मैराथन जीतने के पीछे सिर्फ एक खेल प्रतियोगिता नहीं थी। इसके पीछे एक परिवार की आर्थिक परेशानी, एक बीमार पति और एक पत्नी का अद्भुत संघर्ष था।

सिनेमा के माध्यम से लता की कहानी उन लोगों तक भी पहुंची, जो शायद उनकी वास्तविक जिंदगी के संघर्ष से परिचित नहीं थे।

उम्र नहीं, हौसला मायने रखता है

लता भगवान करे की कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि उम्र किसी सपने या संघर्ष की सीमा तय नहीं करती।

उन्होंने 65 साल की उम्र में वह कर दिखाया, जिसकी कल्पना शायद उन्होंने खुद भी पहले कभी नहीं की होगी।

उनके पास आधुनिक खेल सुविधाएं नहीं थीं। उनके पास प्रोफेशनल ट्रेनिंग नहीं थी। उनके पास रनिंग शूज तक नहीं थे।

लेकिन उनके पास दृढ़ इच्छाशक्ति थी।

आज उनकी कहानी उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो आर्थिक परेशानी, उम्र, संसाधनों की कमी या कठिन परिस्थितियों के कारण अपने लक्ष्य से पीछे हट जाते हैं।

लता भगवान करे से मिलती है जिंदगी की बड़ी सीख

लता भगवान करे की कहानी हमें कई महत्वपूर्ण बातें सिखाती है।

पहली सीख: मुश्किल परिस्थितियों में हार मानना ही एकमात्र विकल्प नहीं है।

दूसरी सीख: किसी काम को शुरू करने के लिए हमेशा परफेक्ट परिस्थितियों का इंतजार नहीं करना चाहिए।

तीसरी सीख: परिवार और अपनों के प्रति प्रेम इंसान को असाधारण ताकत दे सकता है।

चौथी सीख: उम्र केवल एक संख्या है। अगर मन में विश्वास और हिम्मत हो तो किसी भी उम्र में नई शुरुआत की जा सकती है।

और सबसे बड़ी सीख यह है कि जिंदगी में कभी-कभी हमारे सामने रास्ता दिखाई नहीं देता, लेकिन कोशिश करने पर रास्ता बन सकता है।

निष्कर्ष: एक पत्नी की दौड़ बनी प्रेरणा की कहानी

लता भगवान करे की कहानी उस हिम्मत की कहानी है, जो इंसान को सबसे कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की ताकत देती है।

65 साल की उम्र में साड़ी पहनकर नंगे पैर मैराथन दौड़ना अपने आप में असाधारण था। लेकिन उनकी इस दौड़ को महान बनाने वाली बात थी इसका उद्देश्य। उन्होंने अपने पति की बीमारी और इलाज के खर्च के सामने हार नहीं मानी।

यह भी पढ़ें – Student Protest: झारखंड में छात्रों का विधानसभा घेराव, JPSC-JSSC परीक्षा विवाद पर गरमाया माहौल

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Niharika Gupta

NAV24 News की संपादकीय टीम से प्रकाशित रिपोर्ट।

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